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BOKARO NEWS : संतालियों की संस्कृति और परंपरा का उद्गम स्थल है लुगुबुरु

Updated at : 12 Nov 2024 11:09 PM (IST)
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BOKARO NEWS : संतालियों की संस्कृति और परंपरा का उद्गम स्थल है लुगुबुरु

BOKARO NEWS : बोकारो जिले के ललपनिया स्थित लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ संतालियों की धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है.

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राकेश वर्मा/रामदुलार पंडा: बोकारो जिले के ललपनिया स्थित लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ संतालियों की धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है. मान्यता है कि हजारों-लाखों वर्ष पूर्व इसी स्थान पर लुगु बाबा की अध्यक्षता में हुई बैठक में संतालियों के जन्म से लेकर मृत्यु तक के रीति-रिवाज यानी संताली संविधान की रचना हुई थी. इसलिए लुगुबुरु देश-विदेश के संतालियों के लिए गहरी आस्था का केंद्र है. महान धर्मस्थल है. लुगुबुरु संतालियों की संस्कृति व परंपरा का उद्गम स्थल है. हर अनुष्ठान में संताली लुगुबुरु का बखान करते हैं. यहां आने वाले लोग लुगुबुरु मार्ग में ऐसे कई चट्टान हैं, जिसे खरोंच कर अपने साथ ले जाते हैं.

12 साल चली बैठक में हुई थी संविधान की रचना

मान्यता है कि लाखों वर्ष पूर्व दरबार चट्टानी में लुगुबुरु की अध्यक्षता में संतालियों की 12 साल तक मैराथन बैठक हुई थी. हालांकि, संताली गीत में एक जगह गेलबार सिइंया, गेलबार इंदा यानी 12 दिन, 12 रात का भी जिक्र आता है. इस बैठक में संतालियों के संविधान की रचना हुई. इतने लंबे समय तक हुई इस बैठक के दौरान संतालियों ने इसी स्थान पर फसल उगायी और धान कूटने के लिए चट्टानों का प्रयोग किया. इसके चिह्न आज भी आधा दर्जन उखल (उखुड़ कांडी) के रूप में यहां मौजूद हैं. बगल से बहने वाले सीता नाला के पानी का उपयोग पीने के लिए किया. यह नाला करीब 40 फिट नीचे गिरता है, संताली इसे सीता झरना कहते हैं. छरछरिया झरना के नाम से भी जाना जाता है. इसके जल को संताली गाय के दूध बराबर पवित्र मानते हैं. इस झरना का पानी लगातार पीने से कब्ज, गैस्टिक व चर्म रोग आदि दूर होते है. झरना के निकट एक गुफा है, संताली इसे लुगु बाबा का छटका कहते हैं. मान्यता के अनुसार, लुगुबुरु यहीं स्नान करते थे और इसी गुफा के जरिये सात किमी ऊपर स्थित घिरी दोलान(गुफा) के आते-जाते थे.

सात देवी-देवताओं की होती है पूजा

दोरबार चट्टानी स्थित पुनाय थान (मंदिर) में मरांग बुरु और फिर लुगुबुरु, लुगु आयो, घांटाबाड़ी गो बाबा, कुड़ीकीन बुरु, कपसा बाबा, बीरा गोसाईं की पूजा की जाती है.

देश-विदेश से मत्था टेकने आते हैं लाखों श्रद्धालु

लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ में हर साल कार्तिक पूर्णिमा(सोहराय कुनामी) पर यहां लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ समिति द्वारा दोरबार चट्टानी में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संताल सरना धर्म महासम्मेलन का आयोजन किया जाता है. इसमें देश के विभिन्न प्रदेशों झारखंड सहित बिहार, प बंगाल, उड़ीसा, असम, मणिपुर, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, भूटान आदि से श्रद्धालु मत्था टेकने आते हैं. महासम्मेलन में शामिल होकर अपने, धर्म, भाषा, लिपि व संस्कृति को उसके मूल रूप में संजोये रखने, प्रकृति की रक्षा पर चर्चा व संकल्प लेते हैं. यहां सम्मेलन के आयोजन की शुरुआत वर्ष 2001 में हुई. समिति के अध्यक्ष बबूली सोरेन व सचिव लोबिन मुर्मू की अगुवाई में उनके साथियों ने देश-विदेश के संतालियों को एकसूत्र में बांधने को लेकर शुरू के पांच-छह वर्ष जबरदस्त प्रचार-प्रसार किया. आज इस आयोजन को राजकीय महोत्सव का दर्जा प्राप्त है. इसमें 10 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं.

ऐसे पहुंचे ललपनिया

ललपनिया स्थित लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ रांची से 90, दुमका से 218 व प बंगाल के मिदनापुर से 307 किमी दूर है. ललपनिया पहुंचने के दो सड़क रूट हैं. पेटरवार- गोमिया रूट और रामगढ़-नयामोड़ रूट. ट्रेन से बोकारो रेलवे स्टेशन पहुंचा जा सकता है. ललपनिया से 17 किमी दूर गोमिया स्टेशन और 33 किमी दूर रांची रोड स्टेशन है. इन रेल रूटों से भी ललपनिया पहुंचा जा सकता है. जिला प्रशासन नजदीकी रेलवे स्टेशनों से श्रद्धालुओं के लिए बस की सुविधा मुहैया करा रहा है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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