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Jagdish Mahto: झारखंड के ‘ट्री मैन’ जगदीश महतो का निधन, वन सुरक्षा आंदोलन के एक युग का अंत

Jagdish Mahto: झारखंड के ट्री मैन जगदीश महतो नहीं रहे. उन्होंने 65 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली. 450 से अधिक वन सुरक्षा समितियों के गठन में उन्होंने अहम भूमिका निभायी थी. वह वन सुरक्षा आंदोलन के प्रतीक थे.

Jagdish Mahto: बोकारो, दीपक सवाल-कसमार प्रखंड के हिसीम पहाड़ निवासी केंद्रीय वन-पर्यावरण सुरक्षा सह प्रबंधन समिति के अध्यक्ष, पूर्व जिप सदस्य तथा ‘ट्रीमैन’ के रूप में चर्चित वन आंदोलनकारी जगदीश महतो (65 वर्ष) नहीं रहे. रविवार की अहले सुबह उनका हिसीम स्थित पैतृक आवास में निधन हो गया. वह पिछले कुछ महीनों से हार्ट, किडनी व शुगर की बीमारी से जूझ रहे थे. रांची के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा था. इसी बीच रविवार की सुबह करीब चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. वह अपने पीछे एक पुत्री व पत्नी छोड़ गये हैं. उनके निधन से समूचे क्षेत्र में शोक की लहर है. अहले सुबह सोशल मीडिया में खबर फैलते ही अंतिम दर्शन करने वालों का तांता लग गया.

चार दशक तक वन सुरक्षा अभियान का किया नेतृत्व


दिवंगत महतो ने करीब चार दशक तक वन सुरक्षा अभियान का नेतृत्व किया. इस दौरान उन्हें अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा, पर अपने अभियान से कभी पीछे नहीं हटे. उनके नेतृत्व एवं प्रयास से राज्य में लगभग साढ़े चार सौ ग्राम स्तरीय वन प्रबंधन समितियों का गठन हुआ है. सैकड़ों जंगल, जो आज से तीन चार दशक पहले पूरी तरह से कटकर वीरान हो गये थे, वे फिर से लहलहा उठे हैं. स्व. महतो झारखंड सरकार के अलावा कई जगहों पर सम्मानित हो चुके थे. वन विभाग में भी उनका नाम काफी आदर और सम्मान से लिया जाता है. 2015 के पंचायत चुनाव में कसमार दक्षिणी क्षेत्र से जिला परिषद सदस्य भी निर्वाचित हुए थे. उनके निधन पर जनप्रतिनिधियों, पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं एवं ग्रामीणों के अलावा वन विभाग के वरीय अधिकारियों ने भी गहरा शोक जताया है.

प्रभात खबर ने भी किया था सम्मानित


जगदीश महतो वन सुरक्षा अभियान के प्रतीक और पर्याय बन चुके थे. इन्होंने झारखंड, खासकर उत्तरी छोटानागपुर और उससे सटे क्षेत्रों में वनों के संरक्षण एवं संवर्द्धन की दिशा में जो कार्य कर दिखाया, वह अद्भुत और बेमिसाल है. इसी का प्रतिफल है कि इन्हें 2017 में तत्कालीन सीएम के हाथों ‘झारखंड सम्मान’ समेत अन्य कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है. वन विभाग में भी इनके कार्यों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की जाती है. जगदीश को यह उपलब्धि, सम्मान और पहचान रातों-रात नहीं मिल गयी है. इसके लिए संघर्ष और त्याग के दूभर पथों पर चलना पड़ा है. इस दौरान इन पर कई तरह की मुसीबतें आयी, यातनाएं दी गयी. इनके अभियान को रोकने का प्रयास किया गया. पर वह न झुके, न रुके. चट्टान की तरह डटे रहे और कुल्हाड़ी के खिलाफ संघर्ष को अनवरत जारी रखा. परिणामतः, राज्य के साढ़े चार सौ से अधिक जंगलों में हरियाली लाने-लौटाने में इन्हें सफलता मिली है. आंदोलन को जिंदा बनाये रखने के लिए इन्हें कई बार अपने खेत, जमीन, मवेशी और पत्नी के गहने तक बेचने पड़े.

जंगल बचाने की चलायी थी मुहिम


40 साल पुरानी बात है. बोकारो के हिसीम पहाड़ और इसकी तलहटी पर स्थित जंगल तेजी से साफ हो गये थे. अधिकतर जगहों पर तो जंगल के नाम पर केवल ठूंठ बचे थे. इन जंगलों के उजड़ने के पीछे इलाके में सक्रिय लकड़ी माफिया तो थे ही, ग्रामीण भी कम जिम्मेदार नहीं थे. रोजी-रोटी के लिए ग्रामीणों ने स्वयं भी लकड़ी काटकर बेचना शुरू किया. ग्रामीणों में जंगल के प्रति जागरूकता तब आयी, जब जंगल लगभग खत्म हो गये और ठूंठों को भी उखाड़ने की नौबत आने लगी. ठूंठ भी न बचेंगी तो क्या होगा? मूलतः इसी सोच और सवाल ने ग्रामीणों को चिंतित-परेशान करना शुरू किया और यही इनकी जागरूकता का कारण बना.

कुल्हाड़ी के खिलाफ चलाया था अभियान


वह 31 अक्तूबर 1984 का दिन था. हिसीम पहाड़ पर बसे चारों गांव हिसीम, केदला, गुमनजारा और त्रियोनाला के ग्रामीण हिसीम के मध्य विद्यालय प्रांगण में जुटे. इस गंभीर समस्या पर दिन-भर चर्चा चली. अंत में सबों ने निर्णय लिया कि अब किसी भी हाल में एक भी पेड़ पर न खुद कुल्हाड़ी चलायेंगे और न किसी को चलाने देंगे. जो भी थोड़े-बहुत जंगल और पेड़ शेष रह गये हैं, उन्हें हर हाल में बचायेंगे. इस संकल्प के साथ ‘वन सुरक्षा समिति, हिसीम’ गठित की गयी. बैठक के दूसरे दिन से ही कुल्हाड़ी के खिलाफ अभियान शुरू हो गया. दिन तो दिन, रात में भी जंगल की पहरेदारी होने लगी. इसके लिए सदस्यों को बारी-बारी से जिम्मेदारी दी गयी. इसका अनुपालन नहीं करने वालों पर दंड का प्रावधान भी किया गया. ग्रामीण जंगल बचाने को लेकर काफी उत्साहित थे. किंतु, मोटी कमाई करने वाले लकड़ी माफिया भला खामोश कैसे रहते? उन्होंने दूसरे गांवों के ग्रामीणों को इस अभियान के खिलाफ उकसाया. उनके इशारे पर अनेक लोग अभियान के विरोध में उतर आये. पहाड़ पर बसे गांवों के ग्रामीणों को नीचे उतरने पर बुरे परिणाम की चेतावनी दी गयी. लेकिन, समिति वालों ने जिन गांवों के ग्रामीणों को इस अभियान के खिलाफ उकसाया गया था, उन्हें भी इस अभियान में शामिल करने की मुहिम चला ली. उनके बीच भी वनों की सुरक्षा को लेकर जन-जागरूकता अभियान चलाया गया. इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ा. अन्य गांवों में भी वन सुरक्षा समितियां गठित होने लगी. आखिरकार लकड़ी माफियाओं को हार माननी पड़ी. वहीं, कसमार के अलावा दूसरे अंचलों में भी समितियां बनने लगी, और थोड़े समय में ही इसके वृहद रूप को देखते हुए इसका नामकरण ‘उत्तरी छोटानागपुर वन-पर्यावरण सुरक्षा समिति’ कर दिया गया. दो-चार सालों में इसका दायरा दर्जनों अंचलों में फैल गया और यह ‘केंद्रीय वन-पर्यावरण सुरक्षा सह प्रबंधन समिति’ के नाम से जाना जाने लगा. आज लगभग साढ़े चार सौ समितियां इससे जुड़ी हुई है. सैकड़ों जंगल फिर से लहलहा उठे हैं.

लकड़ी माफियाओं ने कई बार किया हमला


इस आंदोलन-अभियान के नेतृत्वकर्ता के तौर पर जगदीश महतो ने अपना पूरा जीवन वनों की सुरक्षा में समर्पित कर दिया. इसके लिए इन्हें कई प्रकार की परेशानी उठानी पड़ी. लकड़ी माफियाओं ने कई बार इन पर हमला किया. झूठे मुकदमों में फंसाया. एक बार रात भर बंधक बनाकर रखा और इस दौरान जूतों की माला पहनायी, पर इन्होंने हार नहीं मानी.

पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधने की शुरुआत की


करीब 30 साल पहले पेड़ों में रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा भी इन्होंने शुरू की. इससे ग्रामीणों का एक भावनात्मक रिश्ता वनों से जोड़ने में मदद मिली, जो वनों की सुरक्षा में काफी सहायक साबित हुआ. वनों को आग से बचाने के लिए भी अहम योगदान दिया. जंगल से सटे गांवों के ग्रामीणों को रोजगार से भी जोड़ने का काम किया. अरविंद कुमार, एमपी सिंह, संजीव कुमार, रविरंजन, कुमार मनीष, पीके नायडू, रजनीश कुमार जैसे कई आइएफएस अधिकारियों ने जगदीश महतो को भरपूर सपोर्ट किया.

अंतिम सांसों तक आंदोलन से जुड़े रहे



स्वर्गीय महतो अंतिम सांसों तक वन-पर्यावरण सुरक्षा अभियान से जुड़े रहे. 25 फरवरी 2025 को पेटरवार स्थित वन विभाग के सभागार में आयोजित केंद्रीय समिति की बैठक की अध्यक्षता की और विभिन्न समितियों के पदाधिकारियों और सदस्यों को वन सुरक्षा अभियान को आगे ले जाने के लिए प्रोत्साहित किया. समिति के सारे लोग स्वर्गीय महतो के नेतृत्व पर आस्था रखते थे. यही कारण है कि करीब एक महीना पहले अपने आवास में हुई बैठक में अपनी अस्वस्थता को देखते हुए जब स्व. महतो ने किसी और को नेतृत्व देने की बात कही थी तो केंद्रीय समिति के सभी पदाधिकारी ने एक स्वर में इसका विरोध किया और कहा कि वे सभी उनके नेतृत्व और दिशा निर्देशन में ही काम करना चाहते हैं. नेतृत्व परिवर्तन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया था.

वन विभाग के अधिकारियों ने भी जताया शोक


स्वर्गीय महतो के निधन पर राज्य के भारतीय वन सेवा के विभिन्न अधिकारियों ने भी शोक जताया है बोकारो डीएफ को रजनीश कुमार ने कहा कि ईश्वर ने एक युग पुरुष को अपने पास बुला लिया हैं. ईश्वर उनकी आत्मा को श्रीचरणों में जगा दें. पीसीसीएफ रैंक के अधिकारी संजीव कुमार ने कहा कि उनका निधन अत्यंत दुखद और इलाके के लिए बहुत बड़ी क्षति है. कुमार मनीष अरविंद ने कहा कि स्वर्गीय महतो ने वनों और वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए बहुत कार्य किया. इसमें अपनी पूरी ऊर्जा लगायी. उनके कार्यों से हमेशा लोगों को प्रेरणा मिलेगी.

झारखंड गौरव सम्मान-2023 से किए गए थे सम्मानित


जगदीश महतो को प्रभात खबर द्वारा भी ‘झारखंड गौरव सम्मान-2023’ से सम्मानित किया गया था. 26 अगस्त 2023 को रांची में आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल एवं अन्य अतिथियों के हाथों स्व. महतो को यह सम्मान मिला था. इसके अलावा कोलकाता समेत अन्य कई जगहों पर भी वह सम्मानित हो चुके थे.

जगदीश के कार्यों को युगों-युगों तक याद रखेंगे लोग : डॉ लंबोदर


जगदीश महतो के निधन से पूरा क्षेत्र मर्माहत है. सूचना मिलते ही स्थानीय पूर्व विधायक डॉ लंबोदर महतो हिसीम पहुंचे तथा निधन पर गहरा शोक जताया. उन्होंने कहा कि वन-पर्यावरण सुरक्षा के क्षेत्र में स्वर्गीय महतो के योगदान को युगों युगों तक याद रखा जाएगा. जिप सदस्य अमरदीप महाराज ने कहा कि अनुशासित, मर्यादित व्यक्तित्व के धनी वन सुरक्षा एवं समाज के प्रति इनका अहम् योगदान सदैव प्रेरणादायी बना रहेगा. प्रखंड प्रमुख नियोती कुमारी, प्रखंड बीस सूत्री अध्यक्ष दिलीप हेंब्रम ने कहा कि वन सुरक्षा के लिए स्वर्गीय महतो हमेशा प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे. इसके अलावा केंद्रीय वन सुरक्षा समिति के उपाध्यक्ष विष्णुचरण महतो, सूरज महतो, सुलेमान अंसारी, कार्तिक महथा, देवशरण हेंब्रम, दिवाकर पांडेय, धनेश्वर महतो, प्रखंड अध्यक्ष गंगाधर महतो, अशोक कुमार सिंह, तपन कुमार झा, आनंद कुमार महतो, लक्ष्मीकांत महतो, फणींद्र मुंडा, जगेश्वर मुर्मू, बालेश्वर हेंब्रम, रामसेवक जायसवाल, घनश्याम महतो, उमेश कुमार जायसवाल, डॉ जीतलाल महतो, दिलीप कुमार महतो, चंद्रकिशोर महतो, सरोज महतो, ब्रजेश मुर्मू, तुलसीदास जायसवाल, रणदेव मुर्मू, शंकर महतो, राजाराम टुडू, सुनील कुमार महतो, उमेश कुमार महतो, संजय जायसवाल, रामविलास महतो, अनिल ठाकुर, राजेश कुमार राय, पंकज कुमार जायसवाल, सोमर महतो, सरोज महतो समेत बड़ी संख्या में लोगों ने श्रद्धांजलि दी.

पढ़ें प्रभात खबर प्रीमियम स्टोरी: History of Munda Tribes 1 : मुंडाओं से पहले भी है झारखंड में जनजातियों का इतिहास, साक्ष्य करते हैं प्रमाणित

Guru Swarup Mishra
Guru Swarup Mishrahttps://www.prabhatkhabar.com/
मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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