Bokaro News : खैराचातर का प्राचीन दुर्गा मंदिर : 16 दिवसीय पूजा की है अनूठी परंपरा

Published by : ANAND KUMAR UPADHYAY Updated At : 22 Sep 2025 11:52 PM

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Bokaro News : 19वीं सदी में तत्कालीन राजा दिगंबर सिंह देव ने की थी दो शताब्दी पुरानी इस परंपरा की शुरुआत, मंदिर आज भी लोक आस्था का केंद्र.

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दीपक सवाल, कसमार, कसमार प्रखंड का खैराचातर गांव अपनी ऐतिहासिक पहचान व धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है. यहां स्थित प्राचीन दुर्गा मंदिर में होने वाली 16 दिवसीय दुर्गा पूजा आज भी अद्वितीय स्वरूप में जीवित है. लगभग दो शताब्दी पुरानी इस परंपरा की शुरुआत 19वीं सदी में तत्कालीन राजा दिगंबर सिंह देव ने की थी. उनकी हवेली के ठीक बगल में बना यह मंदिर आज भी लोक आस्था का केंद्र है.

देश में चुनिंदा जगहों पर ही है यह परंपरा

पूरे देश में 16 दिवसीय दुर्गा पूजा की परंपरा कुछ चुनिंदा स्थानों पर ही देखने को मिलती है. खैराचातर का यह मंदिर उनमें एक है. यहां कृष्ण पक्ष की नवमी से शुक्ल पक्ष की नवमी तक लगातार 16 दिनों तक पूजा होती है. प्रथम दिन ही बोधन कल्पारंभ यानी कलश स्थापना की जाती है और बकरे की बलि दी जाती है. कृष्ण पंचमी को पुनः एक और कलश स्थापित होता है और उस दिन भी बलि दी जाती है. इसके बाद षष्ठी को कल्पारंभ और बेलबरन (बेल वृक्ष के नीचे पूजा) होती है. मुख्य पुरोहित मानस बनर्जी के अनुसार, बोधन कल्पारंभ के साथ ही नित्य पूजा प्रारंभ हो जाती है और पूरे 16 दिन तक निरंतर चलती है. महासप्तमी और महाअष्टमी को मां चंडी को केवल रक्त अर्पित किया जाता है. नवमी के दिन अन्नभोग के साथ बकरे का कलेजी चढ़ाने की परंपरा है, जबकि दशमी को अपराजिता पूजा कर मां को विदा किया जाता है.

इतिहास और पुजारी परंपरा

मंदिर का निर्माण लकड़ी के कोयले से पकाई गई ईंटों से हुआ था. पहले यह खपरैल का मंदिर था, जिसे वर्ष 2021 में एस्बेस्टस की छत से ढका गया. प्रारंभ में ईशानचंद्र बनर्जी मुख्य पुरोहित थे, बाद में उनके पुत्र रामविष्णु और पौत्र यशोदा दुलाल बनर्जी ने जिम्मेदारी संभाली. वर्तमान में यशोदा दुलाल के पुत्र मानस बनर्जी मुख्य पुरोहित हैं, जबकि बगदा निवासी अजित कुमार भट्टाचार्य सहायक पुरोहित हैं. यहां की आरती भी विशेष है. मां के मस्तक से चरणों तक केवल 21 बार थाली घुमाई जाती है, न उससे ज्यादा, न कम. बलि देने का अधिकार केवल राजपरिवार के पास है. वर्तमान में स्वर्गीय कौशलेंद्र किशोर नाथ सिंह की पत्नी वेदवाणी देवी और इनके पुत्र चंदन सिंह, चूड़ामणि सिंह, नीलमणि सिंह आदि यह परंपरा निभाते हैं. जबकि सुधीर चंद्र राय और इनके परिवार के अलावा पूरे राजपूत समाज की इसके सफल आयोजन में अहम भूमिका निभाते हैं. पहले भैंसा बलि होती थी, लेकिन अब यह बंद हो चुकी है.

अकाल बोधन की परंपरा

16 दिवसीय पूजा का आधार है अकाल बोधन. मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने रावण वध से पूर्व देवी दुर्गा का असमय आह्वान किया था. चूंकि उन्होंने कृष्ण पक्ष की नवमी को यह पूजा प्रारंभ की थी, इसलिए खैराचातर में भी उसी दिन से बोधन कल्पारंभ होता है. जबकि सामान्यत: देश में षष्ठी को ही बोधन किया जाता है. मानस बनर्जी बताते हैं कि दुर्गा पूजा तीन प्रकार की होती है – राजसिक (सकाम), तामसिक (अकाम) और सात्विक (निष्काम). खैराचातर की पूजा इन तीनों आयामों का संगम मानी जाती है.

हाट के राजस्व से होती है पूजा

यह मंदिर खैराचातर राजपरिवार से जुड़ा है. 1990 के दशक में जब परिवार में केवल शकुंतला देवी जीवित थीं, तो उन्होंने मूर्ति पूजा की जगह घट पूजा करने का निर्णय लिया. उस कठिन समय में समाजसेवी सुधीरचंद्र राय आगे आये और मूर्ति पूजा की परंपरा को जीवित रखा. मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां चंदा नहीं लिया जाता. पहले खर्च राजपरिवार उठाता था. अब मंदिर के सामने सप्ताह में तीन दिन लगने वाले हाट (बाजार) से मिलने वाले राजस्व से पूजा धूमधाम से संपन्न होती है. नवमी और दशमी को यहां मेला लगता है, जिसमें आसपास के गांवों से हजारों लोग जुटते हैं. पहले यहां भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुआ करते थे. खैराचातर का यह प्राचीन दुर्गा मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी अद्वितीय है. यहां की 16 दिवसीय पूजा आस्था, इतिहास और लोक परंपरा का संगम है. यही कारण है कि यह मंदिर और इसकी परंपरा आज भी पूरे क्षेत्र की पहचान और गौरव का प्रतीक बनी हुई है.

बोधन कल्पारंभ के साथ पूजा शुरू

15 सितंबर को इस मंदिर में बोधन कल्पारंभ यानी बोधन कोठरी में कलश स्थापना के साथ सोलह दिवसीय पूजा शुरू हो गयी है. इस दौरान पुरोहित मानस बनर्जी व अजित भट्टाचार्य ने कलश स्थापना कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना शुरू की. मौके पर बकरे की बलि भी दी गयी. मौके पर राजपरिवार की वेदवाणी देवी, चूड़ामणि देवी, राजेश कुमार राय, सौरभ कुमार राय (मोंटी), सुजीत राय, निवारण हजाम आदि मौजूद थे.

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