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शिक्षा के सच्चे साधक के रूप में जाने जाते थे अरुण कुमार मुखर्जी

Updated at : 05 Sep 2024 12:18 AM (IST)
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शिक्षा के सच्चे साधक के रूप में जाने जाते थे अरुण कुमार मुखर्जी

शिक्षा के सच्चे साधक के रूप में जाने जाते थे अरुण कुमार मुखर्जी

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राकेश वर्मा, बेरमो : बेरमो कोयलांचल के संडे बाजार निवासी स्व अरुण कुमार मुखर्जी आज भी शिक्षा के सच्चे साधक के रूप में याद किये जाते हैं. रसायन शास्त्र के प्रख्यात शिक्षक के रूप में जाने जाते थे, लेकिन हिंदी साहित्य, इंग्लिश लिटरेचर, फिजिक्स, मैथ के अलावा अन्य विषयों में भी पारंगत थे. उनके सैकड़ों छात्र आज उच्च पदों पर कार्य कर रहे हैं. उनका कहना है कि अब अरुण कुमार मुखर्जी जैसे शिक्षा के सच्चे साधक कहां मिलते हैं. अब तो शिक्षा पूरी तरह से प्रोफेशनल हो गयी है.

मूलतः प बंगाल के बारासात निवासी स्व मुखर्जी 70 के दशक के पूर्व माता-पिता के निधन बाद बेरमो आये थे. उनके फुफेरे भाई चंदन कुमार बनर्जी के पिता साधन कुमार बनर्जी ने उन्हें यहां लाया था. मैट्रिक तक की शिक्षा बिहार से पूरी की. बिहार माध्यमिक बोर्ड की परीक्षा में पूरे बिहार में तीसरा स्थान प्राप्त किया था. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए प बंगाल के बहरामपुर चले गये. यहां से उन्होंने एमएससी तक की पढ़ाई की. इसके बाद बेरमो लौटे और हजारीबाग में एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक के रूप में योगदान दिया. हजारीबाग में ही उनकी मुलाकात बेरमो के प्रतिष्ठित रामविलास उच्च विद्यालय के प्राचार्य बीएन प्रसाद से हुई. श्री प्रसाद उनसे प्रभावित हुए और उन्होंने रामविलास उच्च विद्यालय में शिक्षक के रूप में योगदान देने का आग्रह किया. स्व मुखर्जी बेरमो आ गये और 1972 में रामविलास उच्च विद्यालय में शिक्षक के रूप में योगदान दिया. यहां 1980 तक रहे. अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्होंने शिक्षक का पद छोड़ दिया. संडे बाजार स्थित आवास में रहते हुए ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. संडे बाजार दुर्गा मंडप के अलावा अपने घर में सुबह से देर रात तक गरीब और जागरूक बच्चों की टीम बना कर उन्हें कोचिंग देना शुरू किया. सुबह चार-साढ़े चार बजे बच्चों के घर जाकर उन्हें जगाते थे और पढ़ने को कहते थे. उनकी शैक्षणिक शैली ज्यादातर मौखिक हुआ करती थी. लेकिन विषयों पर कमांड इतना कि बच्चों की मानस पटल पर उनकी बातें अंकित हो जाती थी. इधर, तबीयत खराब होने के बाद भी रामविलास उच्च विद्यालय से उनका नाता नहीं टूटा. तत्कालीन प्राचार्य ललित मोहन सिंह ने उन्हें स्कूल के बगल में क्लर्क महेश बाबू के घर में कमरा दिलवा दिया. यहां वह स्कूल की अवधि तक स्कूल को पढ़ाने वाले अन्य शिक्षकों को शैक्षणिक सलाह और गाइडलाइन दिया करते थे. वर्ष 1989 में उनका निधन हो गये. स्व मुखर्जी के एक भाई तरुण कुमार मुखर्जी बंगाल के एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल और होमियोपैथी के डॉक्टर रहे.

हिंदी के सच्चे साधक थे भैया मनोरंजन

राम बिलास उच्च विद्यालय के हिंदी शिक्षक भैया मनोरंजन हिंदी के सच्चे साधक थे. उन्होंने वर्ष 1965 में इस विद्यालय में बतौर योगदान दिया था. वर्ष 1957 में हजारीबाग के हिंदी हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद 1961 में संत कोलम्बस कॉलेज से हिंदी, अंग्रेजी व दर्शनशास्त्र में स्नातक किया था. इसके बाद रांची विश्वविद्यालय से 1963 में हिंदी से एमए किया था.

ट्रिग्नोमेट्री और अलजेब्रा के जानकार थे गरीब दास

बेरमो के राम बिलास उच्च विद्यालय से वर्ष 1993 में सेवानिवृत्त हुए स्व गरीब दास गणित में एसएल सोनी का ट्रिग्नोमेट्री और अलजेब्रा के जानकार थे. उन्होंने कभी विद्यार्थियों को गणित की पढ़ाई किताब खोल कर नहीं करायी. जिस चैप्टर से छात्र सवाल करते थे, उसका जवाब तुरंत ब्लैक बोर्ड पर लिख देते. गणित से पहले वह विद्यालय में इतिहास विषय पढ़ाते थे. विद्यालय के एक छात्र एसडी प्रसाद (सीसीएल के सेवानिवृत्त अधिकारी) के कहने पर गणित पढ़ाना शुरू किया था.

बेरमो के ये शिक्षक भी थे चर्चित

बेरमो के चर्चित शिक्षकों में व्यास सिंह, केपी सिंह, अनिल मुखर्जी, अरुण सर, यमुना सिंह, बिदा सिंह, बाटुल मुखर्जी, भोला मुखर्जी, मीरा बहनजी, मालती बहनजी, विद्या सिंह, गोलक मुखर्जी, पूर्णिमा बहनजी, नवल किशोर सिंह, जयनंदन सिंह, बीएन पांडेय, देवनारायण सिंह, रामस्वरूप सिंह, एचएन सिन्हा, एसएन प्रसाद, किशोर प्रसाद, एमएन पांडेय, ज्योति प्रजापति, मदन प्रजापति, कन्हाई राम, चंडी चरण डे, बिंदेश्वर प्रजापति, जगदीश प्रजापति, अरुण जायसवाल, रघुवीर पांडेय आदि का भी नाम आता है.

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