एक दिन की हड़ताल से पांच एमटी कोल प्रोडक्शन होगा प्रभावित

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बेरमो : कॉमर्शियल माइनिंग के प्रस्ताव के खिलाफ आगामी 16 अप्रैल को देश के कोल इंडिया में आहूत एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल की सफलता को लेकर पांचों सेंट्रल ट्रेड यूनियनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. श्रमिक नेता केंद्र सरकार की मजदूर व उद्योग विरोधी नीतियों के दूरगामी प्रभावों से संगठित और असंगठित मजदूरों […]

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बेरमो : कॉमर्शियल माइनिंग के प्रस्ताव के खिलाफ आगामी 16 अप्रैल को देश के कोल इंडिया में आहूत एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल की सफलता को लेकर पांचों सेंट्रल ट्रेड यूनियनों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. श्रमिक नेता केंद्र सरकार की मजदूर व उद्योग विरोधी नीतियों के दूरगामी प्रभावों से संगठित और असंगठित मजदूरों को उनके निजी जीवन जोड़ सके तो हड़ताल के पूर्ण प्रभावी होने की उम्मीद है. और हड़ताल सफल रही तो कोल इंडिया को कुल पांच मिलियन टन तथा सिर्फ सीसीएल में एक दिन में चार लाख टन कोयला उत्पादन प्रभावित होगा. इससे कंपनी को चार हजार करोड़ का नुकसान होने की आशंका है.
1992 से राष्ट्रव्यापी हड़ताल का दौर शुरू : वर्ष 1992 से देश में जब केंद्र की तत्कालीन सरकार ने नयी आर्थिक व औद्योगिक नीति तथा श्रम सुधार की नीति लायी तो उसी वक्त से देशव्यापी हड़ताल का दौर देश में शुरू हुआ. उदारीकरण, वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण, निजीकरण के साथ-साथ देश के पब्लिक सेक्टर का विनिवेश (खासकर कोयला उद्योग का), रोजगार की गारंटी, न्यूनतम मजदूरी, ठेकेदारी / आउटसोर्सिंग प्रथा, समान काम का समान वेतन, श्रम कानूनों में संशोधन, ट्रेड यूनियनों के अधिकारों पर हमला तेज हुआ. इसके विरोध में सड़क से लेकर सदन तक विरोध हुआ. उक्त नीतियों के खिलाफ वर्ष 1992 से अबतक मजदूर संगठनों ने 16 बार राष्ट्रव्यापी हड़ताल की है.
इसके अलावा कोल इंडिया में भी अलग से कई दफा हड़ताल हुई. इसके अलावा मजदूर संगठनों ने प्रतिवाद स्वरूप जेल भरो व सत्याग्रह आंदोलन के तहत देश भर में अपनी गिरफ्तारियां दीं. रेल रोको-रास्ता रोको आंदोलन किया. देश की संसद के समक्ष तीन बार धरना-प्रदर्शन किया. अबतक किये गये 16 बार की देशव्यापी हड़ताल में अधिकतम तीन दिनों की भी हड़ताल की गयी. दो सितंबर 2015 एवं दो सितंबर 2016 में भी राष्ट्रव्यापी हड़ताल की गयी थी. इनमें कोयला उद्योग में शामिल हड़ताल एेतिहासिक रही थी.
प्रबंधन हर हाल में टालना चाह रहा
मालूम हो कि इस बार कोल इंडिया ने अपना उत्पादन लक्ष्य 652 मिलियन टन निर्धारित किया है, जबकि सीसीएल का उत्पादन लक्ष्य 76.35 मिलियन टन है. इसलिए कोयला मंत्रालय अब इस उद्योग में किसी तरह की हड़ताल को टालना चाहता है, लेकिन मजदूर संगठन के नेताओं के कड़े तेवर के कारण सरकार व कोल इंडिया प्रबंधन की दाल नहीं गल पायी. हालांकि कोयला मंत्रालय व सरकार की ओर से हड़ताल को रोकने के लिए तीन राउंड की वार्ता की गयी, पर सेंट्रल ट्रेड यूनियनों ने कॉमर्शियल माइनिंग के प्रस्ताव की वापसी के बिना किसी भी वार्ता से इंकार कर दिया.
मालूम हो कि पहले कोल इंडिया के प्रभारी चेयरमैन गोपाल सिंह ने फिर इसके बाद कोल सचिव सुशील कुमार ने तथा अंत में कोयला मंत्री पीयूष गोयल ने सेंट्रल ट्रेड यूनियन के नेताओं से वार्ता की. श्रमिक संगठन अपनी बात पर अडिग रहे. इससे मजदूरों की हौसला अफजाई हुई.
हर स्तर पर सक्रिय हैं श्रमिक नेता
मजदूर संगठन के नेता केंद्र सरकार की मजदूर व उद्योग विरोधी नीतियों से मजदूरों को अवगत करा रहे हैं. इसके लिए जगह-जगह पीट मीटिंग, आम सभा, ज्वाइंट कन्वेंशन, परचा-पोस्टर व जनसंपर्क अभियान सहित प्रचार-प्रसार के माध्यम से मजदूरों को इस सांकेतिक हड़ताल की अहमियत समझा रहे हैं. श्रमिक नेताओं को पूरा भरोसा है कि मजदूरों की च˜ट्टानी एकता की बदौलत निश्चित रूप से इस बार भी गत वर्ष के दो सितंबर की राष्ट्रव्यापी हड़ताल की तरह ऐतिहासिक होगी.
इंटक भी शामिल कर लिया गया
16 अप्रैल को कोयला उद्योग में आहूत एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल में कोल फेडरेशन की पांचों सेंट्रल ट्रेड यूनियन शामिल हैं. पहले इस हड़ताल में इंटक को छोड़कर एटक, एचएमएस, बीएमएस व सीटू शामिल था. बाद में एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष रमेंद्र कुमार ने इंटक अध्यक्ष डॉ जी संजीवा रेड्डी से बात की. इसके बाद श्री रेड्डी ने भी इंटक की हड़ताल में शामिल होने की घोषणा की. पांचों यूनियनों का संयुक्त रूप से चार अप्रैल को धनबाद में संयुक्त कन्वेंशन भी होना था, पर जनता मजदूर संघ बच्चा गुट के समारोह स्थल पर हो-हंगामा करने के कारण कन्वेंशन स्थगित कर दिया गया था.
44 श्रम कानून चार संहिता में समाहित
मजदूर संगठनों का कहना है कि कॉमर्शियल माइनिंग से कोयला उद्योग को फिर से निजीकरण की ओर धकेलने की साजिश हो रही है. बड़े औद्योगिक घरानों को अब कोयला खनन के साथ-साथ कोयला बेचने का भी अधिकार होगा. इससे कोल इंडिया को कोयला का खरीदार नहीं मिलेगा. इसके अलावा कोल इंडिया में लगातार विनिवेश हो रहा है. अभी तक दस फीसदी विनिवेश हो चुका है. दस फीसदी और विनिवेश का प्रस्ताव विरोध के कारण रुका हुआ है. पचास फीसदी विनिवेश के बाद कोल इंडिया के मैनेजमेंट का स्वरूप बदल जायेगा.
इसी तरह श्रम कानूनों में संशोधन से देश के 70 फीसदी मजदूर कानून के दायरे से बाहर हो गये. ट्रेड यूनियन एक्ट 1926, मजदूर अधिनियम एक्ट 1936, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम एक्ट 1948, बोनस एक्ट 1965, ग्रेच्युटी एक्ट 1972, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947, एप्रेंटिस एक्ट 1961, समान काम का समान वेतन एक्ट 1976, इंप्लाइज स्टैंडिंग ऑर्डर एक्ट 1946 के अलावा श्रम कानून के संशोधन के कुल 44 प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन थे. उनमें संशोधन करते हुए मात्र चार कोड में सभी को समाहित कर दिया गया है.
इससे मजदूरों की लगभग सारी सुविधा छिन जायेगी. कई हड़ताल में ऐसा देखा जाता है कि कोयला मजदूर अपना आर्थिक नुकसान नहीं उठाना चाहते है. सरकार की मजदूर व उद्योग विरोधी नीतियों पर उनका खासा ध्यान नहीं रहता है. आने वाले समय में इन नीतियों का क्या दूरगामी प्रभाव उन पर पड़ेगा वे यह नहीं सोचते हैं. ऐसे में वेजबोर्ड, वेतन व बोनस जैसे मुद्दे नीतियों पर भारी पड़ जाते हैं.
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