''घाट से घटवार फिसल गये, जुबान फिसली, तो क्या फिसली''

Updated at : 29 Mar 2016 3:32 AM (IST)
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''घाट से घटवार फिसल गये, जुबान फिसली, तो क्या फिसली''

हाजीपुर : पालकी से राजा, राह से कहार, नदी से पानी, घाट से घटवार फिसल गये, जुबान फिसली, तो क्या फिसली’ कविता की ये धारदार पंक्तियां सुना रहे थे राष्ट्रीय स्तर पर युवा कवियों में अपनी पहचान रखनेवाले युवा कवि राकेश रंजन. मौका था गांधी स्मारक पुस्तकालय गांधी आश्रम में मनोरंजन वर्मा की अध्यक्षता एवं […]

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हाजीपुर : पालकी से राजा, राह से कहार, नदी से पानी, घाट से घटवार फिसल गये, जुबान फिसली, तो क्या फिसली’ कविता की ये धारदार पंक्तियां सुना रहे थे राष्ट्रीय स्तर पर युवा कवियों में अपनी पहचान रखनेवाले युवा कवि राकेश रंजन.

मौका था गांधी स्मारक पुस्तकालय गांधी आश्रम में मनोरंजन वर्मा की अध्यक्षता एवं उन्हीं के संचालन में आयोजित मासांत कवि गोष्ठी का. दूसरे युवा कवि अरविंद पासवान की रचना मौन बजता है, शब्द नहीं. शब्द नहीं बजेंगे, तो कौन सुनेगा, उनकी आवाज, जिन्हें आज रोटी भी नसीब नहीं होती, श्रोताओं काे अंदर तक झकझोड़ गयीं.

कविवर उमाशंकर उपेक्षित की वसंतोचित एवं प्रस्तुति परक रचना ओते पते जाते, पते जाना जानक आते पते. आना जानके जाते पते भी उल्लेखनीय रूप से और मुक्त कंठ से सराही गयी. इस अवसर पर नगर एवं जनपद से पधारे अन्य कवियों में हरिविलास राय, विजय कुमार सिंह, विनय कृष्ण, काव्ये बादल, विनोद प्रसाद सिंह, अनिल लोदीपुरी, मेदिनी कुमार मेनन, नागेंद्र मणि, सत्येंद्र कुमार एवं अनाम विश्वजीत की उत्कृष्ट एवं प्रखर रचनाओं ने गोष्ठी को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की. गोष्ठी में विंदेश्वरी राय, पवित्री कुमारी एवं विद्यानंद विभु आदि दर्जनों श्रोताओं की भागीदारी रही.

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