SUPAUL : शनैश्चर अमावस्या के दुर्लभ संयोग में मनाया जायेगा वट सावित्री व्रत

Published by :AMIT KUMAR SINH
Published at :11 May 2026 12:41 PM (IST)
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SUPAUL : शनैश्चर अमावस्या के दुर्लभ संयोग में मनाया जायेगा वट सावित्री व्रत

इस वर्ष वट सावित्री व्रत शनिवार, 16 मई को श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा. खास बात यह है कि इस बार वट सावित्री व्रत पर शनैश्चर अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे ज्योतिष एवं धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जा रहा है.

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सुपौल से राजीव झा की रिपोर्ट :

इस वर्ष वट सावित्री व्रत शनिवार, 16 मई को श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया जाएगा. खास बात यह है कि इस बार वट सावित्री व्रत पर शनैश्चर अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे ज्योतिष एवं धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जा रहा है. पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने बताया कि व्रत, पर्व और त्योहारों की परंपरा हमारे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान संपन्न ऋषि-महर्षियों एवं पूर्वज विद्वानों द्वारा स्थापित की गई है. ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला वट सावित्री व्रत सभी सौभाग्यवती महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. उन्होंने कहा कि यह व्रत संपूर्ण भारतवर्ष में महिलाएं पूरी श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ करती हैं. विधि-विधानपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से पति को दीर्घायु, सुख-समृद्धि तथा संतान सुख की प्राप्ति होती है.

सावित्री ने अपने पातिव्रत्य प्रेम के बल सत्यवान को मृत्यु के मुख से लौटाया

आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने वट सावित्री व्रत की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया कि भद्र देश के निःसंतान राजा अश्वपति ने अपनी पत्नी सहित सावित्री देवी का कठोर व्रत एवं पूजन किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक सुंदर एवं सर्वगुण संपन्न कन्या प्राप्त हुई, जिसका नाम सावित्री रखा गया. युवावस्था में सावित्री ने महाराज दुमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना. देवर्षि नारद ने सावित्री को बताया कि सत्यवान की आयु मात्र एक वर्ष शेष है, लेकिन सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं और सत्यवान से विवाह किया. विवाह के बाद एक दिन सत्यवान जंगल में लकड़ी काटने गए, जहां अचानक उन्हें पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में प्राण त्याग बैठे. उसी समय यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तो पतिव्रता सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ीं. सावित्री की अटूट निष्ठा, धर्मपरायणता और तर्कपूर्ण बातों से प्रसन्न होकर अंततः यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन एवं दीर्घायु का वरदान दिया. तभी से यह व्रत वट सावित्री के रूप में मनाया जाने लगा.

शुभ मुहूर्त प्रातः सात बजकर 05 मिनट से दोपहर एक बजकर 40 मिनट तक

आचार्य मिश्र ने बताया कि इस वर्ष पूजन का शुभ मुहूर्त प्रातः 07 बजकर 05 मिनट से दोपहर 1 बजकर 40 मिनट तक रहेगा. उन्होंने कहा कि प्रथम मुहूर्त अत्यंत विशिष्ट एवं फलदायी माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष की पूजा एवं व्रत करने से महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. इस अवसर पर जिले भर के मंदिरों एवं वट वृक्षों के समीप विशेष पूजा-अर्चना की तैयारी शुरू हो गई है.

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