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जिले में बढ़ रही थैलेसीमिया मरीजों की संख्या, जागरूकता से आयेगी कमी

Updated at : 21 Feb 2026 6:23 PM (IST)
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जिले में बढ़ रही थैलेसीमिया मरीजों की संख्या, जागरूकता से आयेगी कमी

जिले में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि होना चिंता का विषय बना हुआ है

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प्रभात खास – सदर अस्पताल में प्रतिमाह लगभग 40 मरीजों को चढ़ाया जाता है रक्त रौशन सिंह, सुपौल जिले में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या में लगातार वृद्धि होना चिंता का विषय बना हुआ है. खासकर बच्चों में इस अनुवांशिक रक्त रोग के मामले सामने आने से अभिभावकों की परेशानी बढ़ गई है. सदर अस्पताल में प्रतिमाह लगभग 40 थैलेसीमिया से ग्रसित मरीजों को नियमित रूप से रक्त चढ़ाया जा रहा है. चिकित्सकों का कहना है कि समय पर जांच और सही परामर्श से इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई मामले देर से सामने आते हैं. अनुवांशिक रक्त विकार है थैलेसीमिया : डॉ हरिशंकर सदर अस्पताल में कार्यरत शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ हरिशंकर कुमार ने बताया कि थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रक्त विकार है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता. हीमोग्लोबिन की कमी के कारण मरीज को बार-बार रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है. यह बीमारी जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है. यदि नियमित उपचार न मिले तो यह जानलेवा भी हो सकती है. कहा कि थैलेसीमिया मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है. एक माइनर और मेजर होता है. माइनर अवस्था में व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है, लेकिन मेजर थैलेसीमिया में मरीज को हर 15 से 30 दिन के भीतर रक्त चढ़ाना अनिवार्य हो जाता है. प्रतिमाह 40 मरीजों को चढ़ाया जा रहा रक्त जिले में थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है. सदर अस्पताल में प्रतिमाह लगभग 35 से 40 थैलेसीमिया मेजर के मरीजों को नियमित रूप से रक्त चढ़ाया जाता है. इनमें अधिकतर बच्चे हैं, जिनकी उम्र दो वर्ष से लेकर 15 वर्ष तक है. ये बच्चे हर महीने अस्पताल आते हैं और उन्हें ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता होती है. बताया कि कई मामलों में माता-पिता को पहले से जानकारी नहीं होती कि वे थैलेसीमिया माइनर हैं. यदि विवाह से पूर्व या गर्भावस्था के दौरान जांच हो जाए तो इस बीमारी को अगली पीढ़ी में रोका जा सकता है. समय पर जांच से रोकी जा सकती है बीमारी थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रोग है, इसलिए इसका सबसे प्रभावी उपाय जागरूकता और स्क्रीनिंग है. यदि दोनों माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हैं तो बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने की संभावना 25 प्रतिशत तक होती है. उन्होंने बताया कि सरकार द्वारा कई स्थानों पर निःशुल्क जांच की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिन लोग जांच कराने में लापरवाही बरतते हैं. विवाह पूर्व जांच और गर्भावस्था के प्रारंभिक महीनों में स्क्रीनिंग बेहद जरूरी है. इससे गंभीर मामलों को रोका जा सकता है. नियमित रक्त चढ़ाने की चुनौती थैलेसीमिया मेजर के मरीजों को जीवनभर नियमित रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है. इससे शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए विशेष दवाइयां दी जाती हैं. यदि आयरन नियंत्रण में न रहे तो हृदय, यकृत और अन्य अंगों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है. सदर अस्पताल में रक्त की उपलब्धता बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है. हालांकि ब्लड बैंक में नियमित रक्तदान शिविरों के माध्यम से रक्त संग्रह किया जाता है, फिर भी कई बार विशेष ग्रुप के रक्त की कमी हो जाती है. चिकित्सकों ने युवाओं और सामाजिक संगठनों से नियमित रक्तदान करने की अपील की है. जागरूकता अभियान की जरूरत स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विद्यालय स्तर से ही थैलेसीमिया के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जाए तो भविष्य में इस बीमारी के मामलों में कमी लाई जा सकती है. कॉलेजों और पंचायत स्तर पर स्क्रीनिंग कैंप लगाकर युवाओं की जांच की जानी चाहिए. थैलेसीमिया जैसी अनुवांशिक बीमारी से निपटने के लिए केवल स्वास्थ्य विभाग ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की सहभागिता जरूरी है. नियमित रक्तदान, समय पर जांच और सही परामर्श से इस बीमारी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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