धर्म व कर्म हैं एक ही तत्व : आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री

शतचंडी महायज्ञ का सातवें दिन मंत्रोच्चारण और जयघोष से गुंजायमान रहा मंदिर परिसर
– शतचंडी महायज्ञ का सातवें दिन मंत्रोच्चारण और जयघोष से गुंजायमान रहा मंदिर परिसर – आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री ने धर्म और कर्म की एकात्मता पर दिया मार्मिक प्रवचन सुपौल. सदर प्रखंड अंतर्गत बरुआरी पश्चिम स्थित मां दुर्गा, दस महाविद्या, नवग्रह एवं श्रीकृष्ण मंदिर परिसर में आयोजित भव्य शतचंडी महायज्ञ के सातवें दिन रविवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह का अद्भुत दृश्य देखने को मिला. यज्ञ स्थल सहित संपूर्ण मंदिर परिसर दिनभर मंत्रोच्चारण, हवन की पवित्र सुगंध और जय माता दी के गगनभेदी जयघोष से गुंजायमान रहा. सुबह से देर शाम तक श्रद्धालुओं की निरंतर आवाजाही बनी रही, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया. यह शतचंडी महायज्ञ सुप्रसिद्ध पौराणिक कथावाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री पौराणिक महाराज के पावन निर्देशन में विधिवत रूप से संपन्न कराया जा रहा है. आयोजन के सातवें दिन भी दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन एवं यज्ञ में सहभागिता के लिए पहुंचे. महिलाओं, पुरुषों, बुजुर्गों और युवाओं की उल्लेखनीय उपस्थिति ने आयोजन को और भी भव्य एवं जीवंत स्वरूप प्रदान किया. श्रद्धालु पूरे मनोयोग से अनुष्ठानों में सम्मिलित होते दिखे और माता भगवती की आराधना में लीन नजर आए. कथावाचक आचार्य कृष्णानंद जी शास्त्री पौराणिक महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि धर्म की गति अत्यंत सूक्ष्म है. धर्म और कर्म दोनों एक ही तत्व हैं. कर्म ही धर्म है और धर्म ही कर्म. जैसे व्यक्ति का कर्म व्यक्तिगत होता है, वैसे ही उसका धर्म भी व्यक्तिगत होता है. देवी मां ने सृष्टि में कर्म की प्रधानता निर्धारित की है. महर्षि वेदव्यास द्वारा राजा जनमेजय को दिए गए उपदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है.
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