श्राद्ध कर्म के नाम पर बिकती जा रही पुरखों की जमीन

Updated at :09 Jan 2017 7:19 AM
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श्राद्ध कर्म के नाम पर बिकती जा रही पुरखों की जमीन

कोसी की समृद्धि निगल रहा है धार्मिक कर्मकांडों का मकड़जाल मृतक की प्रतिष्ठा व सम्मान के अनुरूप तय होता है भोज का प्रारूप लाखों में तय होता है भोज का बजट सुपौल : कहते हैं कि शरीर शाश्वत है और आत्मा नश्वर. मोह-माया के इस संसार में जो भी आया है, उसे एक दिन वापस […]

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कोसी की समृद्धि निगल रहा है धार्मिक कर्मकांडों का मकड़जाल

मृतक की प्रतिष्ठा व सम्मान के अनुरूप तय होता है भोज का प्रारूप
लाखों में तय होता है भोज का बजट
सुपौल : कहते हैं कि शरीर शाश्वत है और आत्मा नश्वर. मोह-माया के इस संसार में जो भी आया है, उसे एक दिन वापस जाना ही है. लेकिन सांसारिक मोह-माया को त्याग आत्मा को मुक्ति भी तभी मिलती है, जब विधि के अनुसार मृतक का क्रिया-कर्म किया जाये. लेकिन बाध्यता से इतर दिखावा के खेल ने समाज को उस मुहाने पर ला खड़ा किया है, जहां से वापस लौटने की राह मुश्किल नजर आ रही है.
धार्मिक कर्मकांडों का मकड़जाल कोसी इलाके की आर्थिक समृद्धि को निगल रहा है. यहां तक कि श्राद्ध जैसी शास्त्र सम्मत औपचारिकता की मजबूरी में भी जमीनें बेची जा रही हैं और लोग कंगाल हो रहे हैं. निबंधन कार्यालय के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पैसों की जुगाड़ में पुरखों की जमीन का कत्ल हो रहा है. निबंधन कार्यालय के आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो स्पष्ट है कि पूर्वजों के श्राद्ध कर्म के लिए उनकी ही निशानी (जमीन) बिक्री के मामले लगातार बढ़ रहे हैं.
ब्रह्मा भोज से ही पूरा हो जाता है विधान
जानकारों की मानें तो हिंदू धर्म में मौत के बाद पितरों के आत्मा की शांति व तर्पण के उद्देश्य से श्राद्ध किया जाता है. श्राद्धकर्म में पिंड देने का विधान है. मृत्यु के बाद एक निश्चित तिथि को भोज करना भी शास्त्र सम्मत है. मान्यता है कि इससे मृतात्मा को शांति व मुक्ति मिलती है. लेकिन शास्त्रों की मानें तो श्राद्ध के ब्रह्मा-भोज में पांच आदमी को लेकर निबटने का विधान है. भोज में केला के पत्ता की विशेष महत्ता बतायी गयी है. पत्ते पर दही, चूड़ा व मिठाई परोसने की चर्चा है. शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि क्षमता के अनुरूप आमंत्रित लोगों की संख्या बढ़ायी जा सकती है. लेकिन कोसी अंचल में श्राद्ध कर्म भी प्रतिष्ठा से जुड़ गया है. वहीं प्रतिष्ठावश जान गंवाने की कहावत भी चरितार्थ होती नजर आ रही है. श्राद्ध कर्म के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, उसे कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है.
हाल के दिनों में बनगांव, कर्णपुर, बलहा, सुखपुर, गढ़ बरुआरी, जगतपुर, बीना बभनगामा, परसरमा, बरैल, मरुआहा, नवहट्टा, महिषी, सतरवार, परड़ी, चैनपुर, भगवानपुर, बारा, बघवा, सिहौल आदि गांवों में श्राद्ध की झूठी शान में लोग पुरखों की ही जमीन धड़ल्ले से बेच रहे हैं. जबकि शास्त्र कहता है कि यह पूरी तरह अनैतिक और अनुचित है.
झूठी शान-शौकत में बिक जाती है जमीन
इलाके में अगर किसी की मृत्यु हो गयी तो दाह संस्कार के तीन दिन बाद उसके क्रिया कर्म के लिए ग्रामीणों की बैठक होती है. इस बैठक में शामिल लोग अलग-अलग तरीके से अपनी बात रखते हैं.
चर्चा होती है कि मृतक व्यक्ति समाज में कितना प्रतिष्ठित था और समाज में उसका क्या मान-सम्मान था और फिर उनके प्रतिष्ठा और सम्मान के अनुरूप ही भोज का निर्णय होता है. इसमें भी खास यह है कि मृतक अगर नम्र स्वभाव और बेहतर व्यक्तित्व का हुआ तो लोग भोजन सामग्री में घी तक के इस्तेमाल का फैसला सुना देते हैं. हालांकि यह परंपरा कोई नयी नहीं है. लेकिन पुराने समय में ऐसे भोज में अगर मृतक का परिवार सक्षम नहीं होता था तो पूरा समाज अपनी सहभागिता सुनिश्चित करता था. लेकिन आधुनिकीकरण का दौर है और गांव में भी शहर की संस्कृति बसने लगी है तो सामाजिक सहभागिता भी बीते दिनों की बात हो गयी है.
दाल और दियाद जितना गले, उतना अच्छा : कुल मिला कर जब भोज का खांका तैयार होता है तो अनुमानित खर्च भी लाखों में होती है. यहीं से शुरू होती है, जमीन बेचने के सोच की शुरुआत. मृतक परिवार का गोतिया ही इज्जत की दुहाई देता है और चिह्नित जमीन बेचने की सलाह आने लगती है. कोसी के इस इलाके में ऐसे सैकड़ों उदाहरण व्याप्त हैं, जब झूठी शान-शौकत के चक्कर में लोग पुरखों की जमीन बेचने में गुरेज नहीं करते हैं. इनमें कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्होंने जमीन बेच कर बेहतरीन भोज का आयोजन तो कर दिया. लेकिन आज खुद दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं. इधर सलाह देने वालों की धारणा यह रहती है कि ‘दाल और दियाद जितना गले, उतना अच्छा’.
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