कुंठित हो रही खिलाड़ियों की प्रतिभा
Author : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 28 Jun 2016 5:08 AM
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उदासीनता. प्रशासनिक उपेक्षा की वजह से अितक्रमित होता जा रहा गांधी मैदान खेल व खिलाड़ियों के मामले में जिले का भी गौरवपूर्ण इतिहास रहा है. सीमित संसाधनों के बावजूद जिले के कई खिलाड़ियों ने राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का डंका बजा चुके हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसे ऊर्जावान युवाओं के इस […]
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उदासीनता. प्रशासनिक उपेक्षा की वजह से अितक्रमित होता जा रहा गांधी मैदान
खेल व खिलाड़ियों के मामले में जिले का भी गौरवपूर्ण इतिहास रहा है. सीमित संसाधनों के बावजूद जिले के कई खिलाड़ियों ने राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का डंका बजा चुके हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसे ऊर्जावान युवाओं के इस क्षेत्र में सरकारी स्तर पर क्रीड़ा की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. इसके कारण सैकड़ों खिलाड़ी सुविधा व संसाधन के अभाव में कुंठित हो रहे हैं.
सुपौल : वो जमाना बीत गया जब गांव घर के बड़े बुजुर्ग यह मुहावरा कि खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब कह कर बच्चों को खेल से दूर रहने व सिर्फ पढ़ाई से दिल लगाने की नसीहत दिया करते थे. बदलते समय के साथ ही आज खेल के माध्यम से जहां खिलाड़ी अपनी प्रतिभा के बूते पर अपने व परिजनों का नाम रोशन कर रहे हैं, बल्कि खेल में उत्कृष्टता हासिल कर इसे अपना कैरियर भी बना रहे हैं. खेल व खिलाड़ियों के मामले में जिले का भी गौरवपूर्ण इतिहास रहा है.
सीमित संसाधनों के बावजूद जिले के कई खिलाड़ियों ने फुटबॉल, क्रिकेट, ग्रेपलिंग, ऐथलेटिक्स व अन्य कई स्पर्धाओं में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का डंका बजाया है, लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसे ऊर्जावान युवाओं के इस क्षेत्र में सरकारी स्तर पर क्रीड़ा की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. इसके कारण सैकड़ों खिलाड़ी सुविधा व संसाधन के अभाव में कुंठित हो रहे हैं. गौरतलब है कि सरकार द्वारा खेल को बढ़ावा देने की दिशा में कई तरह की योजनाएं चलायी गयी है.
विद्यालय स्तर पर भी इसके लिए अलग कोष उपलब्ध कराया जाता है, लेकिन विभागीय व प्रशासनिक उदासीनता के कारण क्रीड़ा को विकसित करने वाली ऐसी योजनाएं जिले में सरजमीं पर नहीं उतर पा रही है. जिले के अधिकांश विद्यालयों को खेलकूद के लिए अपना मैदान भी नहीं है, जिसकी वजह से क्रय किये गये क्रीड़ा सामग्री स्कूलों की आलमारी में धूल फांक रहा है.
सिकुड़ता जा रहा गांधी मैदान
स्थानीय गांधी मैदान को जिला मुख्यालय की हृदय स्थली माना जाता है. शहर के बीचोबीच अवस्थित यह एेतिहासिक मैदान वर्षों पूर्व में हुए खेल के बड़े आयोजनों का गवाह रहा है, लेकिन समय के साथ ही स्थिति बदलती जा रही है. मैदान से सटे सरकारी भवन, मंच, हेलीपेड आदि के निर्माण की वजह से यह मैदान दिन ब दिन सिकुड़ता जा रहा है. जगह कम पर जाने की वजह से यह मैदान अब बड़े खेल आयोजन के लायक नहीं रह गया है. बावजूद शहर के मध्य में रहने के कारण आज भी प्रतिदिन दर्जनों छोटी-छोटी टीम व हर उम्र के बच्चे इस मैदान में विभिन्न प्रकार के खेलों का अभ्यास करते नजर आते हैं. सरकारी उदासीनता को लेकर इन बच्चों में व्याप्त असंतोष स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.
जंग खा रहा लाखों की सामग्री
मालूम हो कि वर्षों पूर्व जिला प्रशासन द्वारा खेल के विकास के लिए लाखों की खेल सामग्री की खरीदारी की गयी थी. इनमें क्रिकेट का बैट, पैड, मैट आदि शामिल था, लेकिन विडंबना है कि वर्षों बाद भी यह सामग्री किसी भी जिला खेल संघ को नहीं सौंपी गयी. इसके कारण जहां खिलाड़ी इन सामग्रियों से मिलने वाले लाभ से वंचित रह गये. वहीं लाखों की लागत से खरीदा गया सामान गोदाम में सड़ रहा है.
पुनरुद्धार की हो रही मांग
जिला एथलेटिक्स संघ के सचिव नगेंद्र चौधरी, जिला फुटबॉल संघ के सचिव सुमन कुमार सिंह, डीसीए के जिला सचिव शशि भूषण सिंह आदि ने गांधी मैदान व स्टेडियम के पुनरुद्धार की मांग की है. ताकि संसाधनों के अभाव में जिले के प्रतिभावान खिलाड़ियों की प्रतिभा को भविष्य में कुंठित होने से बचाया जा सके.
बेकार पड़ा है स्टेडियम
मालूम हो कि डेढ दशक पूर्व खिलाड़ियों की सुविधा के लिए सरकार द्वारा जिला मुख्यालय के उत्तरी हिस्से पर लाखों की लागत से स्टेडियम का निर्माण करवाया गया, लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद स्टेडियम को अब तक खेल सुविधाओं से संपन्न नहीं बनाया जा सका है. उचित देखरेख के अभाव में स्टेडियम का मैदान जर्जर हो गया है. वहीं मैदान में घास भी उग आये हैं. प्रशासनिक बदइंतजामी का आलम यह है कि आज तक इस स्टेडियम में खेल का कोई भी बड़ा आयोजन नहीं कराया जा सका.
वहीं भूदान व अग्निशमन जैसे कई सरकारी विभागों ने स्टेडियम पर कब्जा जमा रखा है. परिवहन विभाग के अधिकारी भी वाहन चालकों का टेस्ट इसी मैदान में लेते हैं, जिसके कारण मैदान की स्थिति और भी चिंताजनक हो गयी है.
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