कोसी के कछार पर दलों का दावं-पेच

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आर्थिक पिछड़ापन के बावजूद सुपौल राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील जिला रहा है. आचार्य कृपलानी व बीपी मंडल सरीखे लोगों ने यहां का प्रतिनिधित्व किया है. विकास पुरुष ललित बाबू की जन्म भूमि पर कोसी की बाढ़ व रेल आमान परिवर्तन अब भी प्रमुख समस्या बनी हुई है. जिले में विधानसभा की पांच सीटें हैं. […]

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आर्थिक पिछड़ापन के बावजूद सुपौल राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील जिला रहा है. आचार्य कृपलानी व बीपी मंडल सरीखे लोगों ने यहां का प्रतिनिधित्व किया है. विकास पुरुष ललित बाबू की जन्म भूमि पर कोसी की बाढ़ व रेल आमान परिवर्तन अब भी प्रमुख समस्या बनी हुई है. जिले में विधानसभा की पांच सीटें हैं.

2010 के चुनाव में पांचों सीट पर जदयू को जीत मिली थी. तब जदयू के साथ भाजपा भी थी. अब परिथति बदल चुकी है.वहीं मधेपुरा जिले में विधानसभा की चार सीटें हैं. इनमें से तीन सीट जदयू को और एक सीट राजद को मिली थी. यहां की भी परिस्थितियां करीब-करीब सुपौल जैसी ही हैं. गंठबंधन के नये समीकरण में सीटों को लेकर तसवीर साफ होनी है.

सुपौल

घटक दलों की टिकट पर नजर

सुपौल विधानसभा सीट पर बीते 15 वर्षो से जदयू का कब्जा है. बिहार सरकार के वित्त मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव बीते 25 वर्षो से क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. गत चुनाव में राजद के रवींद्र कुमार रमण ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी.

फिर भी लगभग 13 फीसदी वोटों के अंतर से उन्होंने रमण को हराया था. राजद के महागंठबंधन में शामिल होने के बाद अब यहां उनका मुकाबला सीधे तौर पर एनडीए से है. विजेंद्र प्रसाद यादव को जहां राजद व कांग्रेस के साथ का फायदा होगा. वहीं भाजपा से अलग होने का नुकसान भी. एनडीए के प्रत्याशी का निर्णय होना बाकी है. मजबूत प्रत्याशी से ही कड़ी टक्कर की संभावना जतायी जा रही है.

हालांकि महागंठबंधन में तो प्रत्याशी तय माना जा रहा है, लेकिन एनडीए में टिकट के लिए जबरदस्त मारामारी है. फिलहाल किस दल का उम्मीदवार होगा, इस पर ही संशय है. अभी तो भाजपा सहित एनडीए के सभी घटक दल अपनी-अपनी तैयारी कर रहे हैं. कई ऐसे भी नेता हैं, जिन्होंने खुद को उम्मीदवार मानते हुए जनसंपर्क भी शुरू कर दिया है.

अब तक

अब तक विस चुनाव में इस सीट से जदयू ने चार बार, जनता दल व जनता पार्टी ने एक-एक बार एवं कांग्रेस ने दो बार जीत दर्ज की. ढ़ाई दशक से इस विधानसभा सीट पर विजेंद्र यादव का कब्जा है.

इन दिनों

जदयू हर घर दस्तक दे रहा है, तो भाजपा परिवर्तन रथ के साथ चुनावी अभियान में जुटी है. राजद , कांग्रेस व हम पार्टी के कार्यकर्ता भी काफी सक्रिय हैं. रालोसपा का भी विस सम्मेलन जारी है.

प्रमुख मुद्दे

रेल का आमान परिवर्तन

शहर का आधुनिकीकरण

रेलवे क्रांसिंग पर फ्लाइ ओवर का निर्माण

व्यावसायिक व उच्चतर शिक्षा व्यवस्था.

पिपरा

बदल चुकी है दलों की जमीनी पकड़

नये परिसीमन के बाद पिपरा विधानसभा अस्तित्व में आया. 2010 में हुए चुनाव में जदयू की सुजाता देवी ने यहां से जीत दर्ज की थी. उन्होंने लोजपा के दीनबंधु यादव को काफी मतों के अंतर से हराया था, लेकिन सुजाता देवी के पति व पूर्व सांसद विश्वमोहन कुमार इस बार पाला बदल कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं.

अब देखना यह होगा कि उन्हें दोबारा जदयू से टिकट प्राप्त होता है या नहीं. वैसे क्षेत्र में उनके या उनके पति के भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की भी चर्चा है. कुल मिला कर इस क्षेत्र में महागंठबंधन एवं राजग के बीच राजनीतिक असमंजस की स्थिति बनी हुई है. दोनों गंठबंधनों में टिकट के दावेदारों की सूची लंबी है.

जदयू नेता दिलेश्वर कामत पूर्व में इस क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं. 2010 के चुनाव में टिकट नहीं मिलने पर वह बागी हो गये थे. इस बार फिर जदयू से टिकट के लिए दावेदारी कर रहे हैं. चूंकि भाजपा से अलग होने के बाद भी इस सीट पर जदयू की पकड़ मजबूत है और लोकसभा चुनाव में उसे सबसे ज्यादा वोट मिले. इसलिए इस दल में टिकट को लेकर मारामारी ज्यादा है.

अब तक

अब तक-नये परिसीमन के बाद पिपरा विधानसभा क्षेत्र की स्थापना हुई. जदयू की सुजाता देवी को इस क्षेत्र का प्रथम विधायक बनने का गौरव प्राप्त हुआ. उनके पति विश्वमोहन कुमार सांसद थे.

इन दिनों

जदयू व राजद के साथ ही भाजपा गंठबंधन चुनावी अभियान में जुटी है.विधानसभा सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों के बहाने कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया जा रहा है.

प्रमुख मुद्दे

शहरी विकास व एनएच 106 का विस्तार

ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली व अन्य बुनियादी सुविधाएं

स्वास्थ्य व शिक्षा केंद्रों का विस्तार.

त्रिवेणीगंज

समीकरण बदलने से चुनौती बढ़ी

त्रिवेणीगंज इस जिले का एक मात्र सुरक्षित विधानसभा सीट है. बीते चुनाव में यहां जदयू की अमला देवी ने जदयू के अनंत कुमार भारती को वोटों के बड़े अंतर से हराया था. उनका इस बार भी पार्टी प्रत्याशी होना तय माना जा रहा है. नये समीकरण में लोजपा के साथ भाजपा, रालोसपा व हम पार्टी हैं. ऐसे में वर्तमान विधायक को कुरसी बचाने की बड़ी चुनौती मिलेगी.

हालांकि उन्हें राजद और कांग्रेस के समर्थन का लाभ मिलेगा. देखना होगा कि इस चुनाव में भाजपा गंठबंधन किसे उम्मीदवार बनाता है. हालांकि लोजपा का इस सीट पर दावा स्वाभाविक माना जा रहा है. एनडीए समर्थकों का मानना है कि स्थानीय प्रत्याशी होने पर उसे ज्यादा लाभ मिल सकता है. देखना है कि यहां किसे टिकट मिलता है.

इन दिनों

चुनावी आगाज के बावजूद मुख्यालय का राजनीतिक तापमान अब तक सामान्य है. हालांकि अंदरूनी रूप से मतदाताओं का नब्ज टटोलने व विभिन्न कार्यक्रमों के बहाने रिझाने की कोशिश जारी है.

प्रमुख मुद्दे

रेल हेड से जोड़ने की मांग

अपराध पर नियंत्रण त्न पिछड़े क्षेत्र का बुनियादी विकास

जदिया को प्रखंड का दर्जा

स्वास्थ्य सेवा में सुधार और विस्तार

रोजगार के साधन

तकनीकी व उच्च शिक्षा की व्यवस्था.

निर्मली

अपने-अपने काम गिनाने में जुटीं पार्टियां

विगत विधानसभा चुनाव में जदयू के अनिरुद्ध प्रसाद यादव ने इस क्षेत्र से सर्वाधिक मतों से जीत हासिल की थी. भाजपा से अलग होने के बाद भी इस सीट पर जदयू का दबदबा कायम रहा.

लोकसभा चुनाव में भी उसे सबसे ज्यादा वोट मिले. यादव पुराने परिसीमन के तहत किशनपुर विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते थे. उनसे पूर्व कांग्रेस के विजय कुमार गुप्ता यहां के विधायक रहे थे. पिछले चुनाव में गुप्ता दूसरे स्थान पर रहे थे.

सीटिंग गेटिंग के तहत यह सीट कांग्रेस को मिलेगी या नहीं, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता. उसे इस बार राजद के भी वोट बैंक का लाभ मिल सकता है. भाजपा कोसी सड़क व रेल महासेतु के निर्माण को भुनाने का प्रयास करेगी.

वहीं उसे रालोसपा व हम के वोटरों से भी फायदा का अनुमान है. हालांकि अभी यह तय नहीं हुआ है कि यह सीट राजग के किस पार्टी के झोली में जायेगी. प्रत्याशी का सही चयन चुनाव दंगल को दिलचस्प बना सकता है.

हालांकि एनडीए का एक धड़ा रालोसपा इस सीट पर अपना दावा कर रहा है. रालोसपा इस सीट पर लगातार कार्यक्रम भी कर रहा है. इस विधानसभा का 32 पंचायत कोसी के बाढ़ से प्रभावित होता रहा है. ऐसे में यह मुद्दा जोर-शोर से गूंजेगा.

इन दिनों

राजनीतिक दल जमीन पुख्ता करने में लगे हैं. जदयू का हर घर दस्तक तथा भाजपा का परिवर्तन रथ व जन संपर्क अभियान चल रहा है. दर्जनों ऐसे नेताजी पसीना बहा रहे हैं जो टिकट के दावेदार हैं. हालांकि उनका दल अभी तय नहीं है.

मुद्दे

विकास की मुख्य धारा से जोड़ना

शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण सड़क की समस्या

बाढ़ व कटाव से विस्थापितों की समस्या.

छातापुर

राजनीतिक तसवीर में उलट-फेर

छातापुर इस जिले का सबसे पिछड़ा विधानसभा क्षेत्र माना जाता है. विकास का भरोसा यहां का मुख्य चुनावी मुद्दा रहा है. पिछले चुनाव में जदयू के नीरज कुमार बबलू ने राजद के अकील अहमद को मतों के बड़े अंतर से हराया था. बबलू बागी हो चुके हैं. उनकी पत्नी नूतन सिंह लोजपा के टिकट पर विधान परिषद पहुंची हैं.

माना जा रहा है कि इस बार यह सीट राजद के खाते में जायेगी और पिछले चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे अकील अहमद महागंठबंधन के प्रत्याशी रहो सकते हैं. देखना यह होगा कि निवर्तमान विधायक किस पार्टी से चुनाव लड़ते हैं और राजग किसे अपना प्रत्याशी बनाता है. इस विधानसभा क्षेत्र में अल्पसंख्यक व अतिपिछड़ों की आबादी बड़ी है.

वहीं सर्वण मतदाता निर्णायक भूमिका अदा करते हैं. कुसहा त्रसदी में सबसे अधिक क्षति भुगतनेवाले इस क्षेत्र में विरोधी दल कोसी पुनर्वास का मुद्दा उठायेंगे. स्थानीय प्रत्याशी की मांग भी उठ रही है. लिहाजा महागंठबंधन के साथ ही यहां एनडीए गंठबंधन के लिए भी यह सीट महत्वपूर्ण बना हुआ है.

इन दिनों

भाजपा का परिवर्तन रथ विधानसभा क्षेत्र में भ्रमणशील है, जबकि जदयू हर घर दस्तक देकर उपलब्धियां गिनाने में जुटा है. अन्य दल भी समीकरण के हिसाब से केंद्र या राज्य सरकार को केंद्र में रख की गतिविधियां चला रहे हैं.

प्रमुख मुद्दे

सड़क व रेल यातायात की समस्या

कोसी पुनर्वास का कार्य

कुसहा त्रसदी से जीर्ण-शीर्ण क्षेत्र का पुनरुद्धार

पाने के पानी का इंतजाम

अस्पतालों में व्यवस्था में सुधार

रोजगार के साधन.

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