मिथिला का प्रसिद्ध पर्व देवोत्थान एकादशी आज, होगा तुलसी विवाह भी
Updated at : 08 Nov 2019 7:29 AM (IST)
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सुपौल : मिथिला का प्रसिद्ध पर्वों में से एक देवोत्थान एकादशी पर्व हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार शुक्रवार को मनाया जायेगा. इस दिन लोगों द्वारा व्रत रख कर संध्या काल में पिठार व सिंदूर से अर्पण देकर कुलदेवता सहित विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के साथ की जायेगी. अगले दिन ब्राह्मण भोजन करा कर व्रत समाप्त होगी. […]
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सुपौल : मिथिला का प्रसिद्ध पर्वों में से एक देवोत्थान एकादशी पर्व हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार शुक्रवार को मनाया जायेगा. इस दिन लोगों द्वारा व्रत रख कर संध्या काल में पिठार व सिंदूर से अर्पण देकर कुलदेवता सहित विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के साथ की जायेगी. अगले दिन ब्राह्मण भोजन करा कर व्रत समाप्त होगी.
यह पर्व दीपावली, छठ के बाद मनाया जाता है. इसी दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन देवी-देवता विश्राम करने चले जाते हैं और उससे पहले पुन: कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन उठते हैं. इसे देवोत्थान एकादशी कहा जाता है.
पंडितों के अनुसार देवोत्थान एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागने के बाद शुभ तथा मांगलिक कार्य शुरू होते हैं. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तुलसी विवाह कराना बहुत ही शुभ होता है. जहां विभिन्न जगहों पर तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है. इसके अलावे इस दिन भगवान विष्णु समेत सभी देवताओं की पूजा- अर्चना की जाती है. साथ ही व्रत भी रखा जाता है.
देवोत्थान एकादशी के दिन प्रात: उठ कर भगवान विष्णु की पूजा और उन्हें जगाने का आह्वान करने के साथ व्रत का संकल्प लिया जाता है. भगवान विष्णु का ध्यान तो करना ही चाहिए. साथ ही एकादशी के व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही शुरू की जाती है.
पंडितों के अनुसार घर की सफाई करने के बाद स्नान व साफ वस्त्र धारण कर घर के आंगन में भगवान विष्णु के चरणों की आकृति बना कर एक ओखली में चित्र बना कर फल, मिठाई, ऋतु फल और गन्ना उस स्थान पर उसे डाली से ढकी जाती है.
इस दिन रात्रि में घरों के बाहर और पूजा स्थल पर दिया भी जलायी जाती है. इसके बाद भगवान को शंख, घंटा आदि बजा कर उठाया जाता है तथा विष्णु भगवान को इस दिन चंद्रामित से स्नान भी करायी जाती है. शास्त्रों के मुताबिक जिन दंपत्तियों में कोई कन्या नहीं होती, उन्हें कन्यादान का पुण्य प्राप्त करने के लिये उन्हें तुलसी विवाह अवश्य करनी चाहिए.
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