चौठचंद्र व तीज व्रत आज, दिनभर व्रती रखेंगी उपवास
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 12 Sep 2018 5:52 AM
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बाजार में बढ़ी चहल-पहल, फल व दूध की खूब हुई बिक्री सुपौल : मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व चौठचंद्र और तीज जिले में बुधवार को मनाया जायेगा. इसे लेकर मंगलवार को बाजार में काफी गहमा-गहमी देखी गयी. लोग मिट्टी के बर्तन, फल, दूध आदि खरीदने में जुटे थे. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक मिथ्या कलंक से बचने […]
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बाजार में बढ़ी चहल-पहल, फल व दूध की खूब हुई बिक्री
सुपौल : मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व चौठचंद्र और तीज जिले में बुधवार को मनाया जायेगा. इसे लेकर मंगलवार को बाजार में काफी गहमा-गहमी देखी गयी. लोग मिट्टी के बर्तन, फल, दूध आदि खरीदने में जुटे थे. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक मिथ्या कलंक से बचने के लिये चौठचंद्र का त्योहार मनाया
जाता है.
श्रद्धालु इस मौके पर नये मिट्टी के बर्तन नियम निष्ठा के साथ दही जमा कर चंद्रमा को अर्पण करते हैं और शंख जल से चंद्रदेव को अर्घ्य भी दिया जाता है. इस पर्व में डाली व सूप भी चढ़ाया जाता है. जिसमें सेब, केला, नारंगी व दही के छांछ से भरा जाता है. व्रती दिन भर के उपवास के बाद संध्या में इसे चंद्रदेव को अर्पण करते हैं. जिसके बाद वे अन्न-जल ग्रहण करते हैं. मौके पर परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने हाथों में एक फल लेकर चंद्रमा का दर्शन करते हैं. साथ ही अपने व परिवार के लिये मंगल कामना करते हैं. मिथिलांचल में यह पर्व काफी लोकप्रिय है. इस मौके पर लोग अपने सगे व रिश्तेदारों के घर प्रसाद, दही आदि का भार (संदेश) लेकर भी जाते हैं.
हरितालिका व्रत या तीज का पर्व सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा अपने अखंड सुहाग के लिये निर्जला उपवास रख कर किया जाता है. मान्यता के मुताबिक सर्वप्रथम यह व्रत माता पार्वती ने भगवान शंकर को पाने के लिये किया था. इस दिन विशेष रूप से गौरी-शंकर की पूजा की जाती है. पर्व के दिन स्त्रियां नहा-धोकर शृंगार करती हैं.
पूजन के लिये केले के पत्तों का मंडप बना कर गौरी-शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है. पार्वती जी के सुहाग का सारा सामान भी इसमें रखा जाता है. दिन भर के निर्जला उपवास के बाद संध्या काल में भजन-कीर्तन आदि किया जाता है. दूसरे दिन सुबह पूजा के उपरांत उपवास समाप्त किया जाता है. कुछ जगहों पर शाम में भी व्रत समाप्त करने की परंपरा है. व्रती महिलाओं द्वारा जिले में तीज की तैयारी जोर-शोर से की जा रही है.
गणेश जी के श्राप के कारण कृष्ण पर लगा था चोरी का आरोप
पौराणिक कथाओं के मुताबिक एक बार विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश को चंद्रलोक से भादो मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन भोज का आमंत्रण मिला, वे भोज में पहुंच कर भोजन के उपरांत अपना प्रिय लड्डू व मोदक अपने साथ लेकर वापस भी चले. इसी क्रम में रास्ते में लड्डू नीचे गिर पड़ा. जिसे देख चंद्रमा हंस पड़े. उनकी हंसी से क्रोधित होकर गणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि जो कोई उसे देखेगा, उस पर चोरी का इल्जाम लग जायेगा. चंद्रदेव ने श्राप से मुक्त करने के लिये भगवान गणेश की काफी मिन्नत की. बाद में श्रीगणेश ने उस श्राप को मात्र चतुर्थी के दिन तक के लिये सीमित कर दिया. एक बार भगवान कृष्ण पत्नी रूकमणि के साथ अपने महल में थे. तभी उनकी नजर चंद्रमा पर पड़ गयी. उस दिन चतुर्थी था. द्वापर युग में सत्राजित नामक एक राजा था. जिसने सूर्यदेव को प्रसन्न कर स्यमंतक मणि प्राप्त किया था. माना जाता था कि जिसके पास वह मणि होती थी, वह सभी समस्याओं से मुक्त होता था. मणि रोज आठ भरी सोना भी देती थी. एक दिन श्रीकृष्ण ने राजा के मुकुट पर वह मणि देखी तो कृष्ण ने कहा कि इस मणि का असली हकदार तो राजा उग्रसेन हैं. उसी रात राजा के भाई मणि लेकर जंगल में शिकार करने चले गये. जहां शेर ने उन्हें मार डाला. मणि शेर के पेट में चला गया. बाद में जामवंत ने उस शेर का शिकार कर मणि हासिल कर लिया.
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