अाज भी बेटियों के प्रति संवेदनशील नहीं है समाज

Published at :29 Jun 2017 5:12 AM (IST)
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अाज भी बेटियों के प्रति संवेदनशील नहीं है समाज

गलत मानसिकता के लोग इस कुरीति को दे रहे बढ़ावा दहेज प्रथा नवजात बेटियों के वध का मूल कारण सुपौल : कोसी क्षेत्र में आज भी नवजात बच्चियों को उनकी दुनिया में आने से रोका जा रहा है. हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग हैं, जो इस कुरीति को समाप्त होने में बाधक बन रही […]

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गलत मानसिकता के लोग इस कुरीति को दे रहे बढ़ावा

दहेज प्रथा नवजात बेटियों के वध का मूल कारण
सुपौल : कोसी क्षेत्र में आज भी नवजात बच्चियों को उनकी दुनिया में आने से रोका जा रहा है. हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग हैं, जो इस कुरीति को समाप्त होने में बाधक बन रही है. ऐसे मामलों में ये लोग एक रहा करते हैं. इस वजह से विरोध में एक पत्ता तक नहीं हिलता और बेटी को मार डालते हैं. पूर्व में कोसी कंसोर्टियम द्वारा कराये गये सर्वे में भी इसका खुलासा हुआ था. 2011 की जनगणना के आंकड़े एक भयावह समाज की तसवीर पेश करते हैं. आंकड़ों के मुताबिक हमारा समाज बेटियों के प्रति संवेदनशील नहीं है. बेटियों की आबादी न केवल घट रही है, बल्कि छह वर्ष तक की आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या भी कम हुई है.
केस स्टडी 01
मरौना थाना क्षेत्र के मरौना दक्षिण पंचायत स्थित प्राथमिक विद्यालय कोइरीपट्टी पुलिया के पास 28 मई की शाम एक नवजात का शव मिलने से सनसनी फैल गयी. नवजात को देखने से पता चल रहा था कि कुछ घंटे पूर्व ही उसे किसी ने फेंका है.
केस स्टडी 02
पिपरा थाना क्षेत्र के एनएच 106 कमलपुर पुल के पास झाड़ी में 3 जून को एक नवजात बच्ची मिलने के बाद लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी. कमलपुर निवासी कमल राम ने झाड़ी में नवजात को देख इसकी सूचना आस-पड़ोस के लोगों को दी थी. साथ ही नवजात को झाड़ी से निकाल कर पीएचसी लाया. जहां चिकित्सकों ने तत्काल उपचार कर बच्ची को बचा लिया.
केस स्टडी 03
बीते 16 जून को निर्मली थाना अंतर्गत दिघिया गांव के कमला स्थान के पास कोसी किनारे एक नवजात बच्ची मृत अवस्था में मिली. लोगों द्वारा तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे. लोगों का कहना था कि बेटी होने के कारण ही इसकी जान ली गयी है.
क्या कहता है एक्ट : गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट) कानून के तहत लिंग चयन या लिंग जांच के बाद गर्भ में पल रहा भ्रूण लड़का है या लड़की, ये जानना कानूनन अपराध है.
2011 की जनगणना के आंकड़ों में कोसी
आंकड़ा प्रति हजार पुरुषों पर
सहरसा- 906
सुपौल- 925
मधेपुरा- 914
पूर्णिया- 930
किशनगंज- 946
कटिहार- 916
अररिया- 921
मिली जानकारी के मुताबिक, अधिकांश कन्याओं का वध इलाके की ग्रामीण दाई महज कुछ रुपये या फिर अनाज लेकर कर डालती हैं. बताया गया कि अब ग्रामीण दाई के साथ ही गृहस्वामी भी इस कुरीति को बढ़ावा दे रहे हैं. मूल कारण दहेज प्रथा माना जा रहा है. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है. पूर्व में ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन द्वारा भागलपुर जिले के नवगछिया प्रखंड में कराये गये सेंपल सर्वे में भी यह बातें सामने आयी थी कि महज कुछ किलो अनाज व सौ-पचास रुपये के लिये ग्रामीण दाई नवजात कन्याओं का वध कर डालती हैं. यहां भी सर्वेक्षण के क्रम में इसका मूल कारण तिलक दहेज की कुरीति ही खुलकर सामने आयी थी.
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