दुबारा जांच से मचा हड़कंप

Published at :05 Sep 2016 6:37 AM (IST)
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दुबारा जांच से मचा हड़कंप

सीतामढ़ी : जिले के बेला थाना क्षेत्र के चांदी रजवाड़ा गांव के मुनमुन सिंह हत्याकांड की फिर से जांच शुरू कर दी गयी है. मानवाधिकार आयोग के हस्तेक्षप एवं सीआइडी की जांच रिपोर्ट के आधार पर एसपी हरि प्रसाथ एस ने नगर थानाध्यक्ष को 14 बिंदुओं पर दुबारा जांच करने का आदेश दिया है. मामले […]

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सीतामढ़ी : जिले के बेला थाना क्षेत्र के चांदी रजवाड़ा गांव के मुनमुन सिंह हत्याकांड की फिर से जांच शुरू कर दी गयी है. मानवाधिकार आयोग के हस्तेक्षप एवं सीआइडी की जांच रिपोर्ट के आधार पर एसपी हरि प्रसाथ एस ने नगर थानाध्यक्ष को 14 बिंदुओं पर दुबारा जांच करने का आदेश दिया है. मामले में अब नया मोड़ आ गया है. अब तक की जांच में हत्या के लिए उसी को दोषी माना गया है जिसने इस संबंध में प्राथमिकी दर्ज करायी थी. दोबारा जांच शुरू होने से संबंधित लोगों में हड़कंप मच गया है.

क्या है मामला
14 अगस्त 2009 को मुनमुन सिंह (मृतक) गांव के नरेश ठाकुर से एक लाख 70 हजार रूपया लेकर जमीन रजिस्ट्री करने के लिए डुमरा निबंधन कार्यालय पहुंचा था. दस्तावेज का सारा मसौदा तैयार कर लिया गया था. दस्तावेज रजिस्ट्रार कार्यालय में पेश होना था. इसी बीच, इसकी जानकारी मुनमुन के भाई अमरनाथ सिंह को मिली. अमरनाथ 4-5 साथियों के साथ निबंधन कार्यालय पहुंचा और मुनमुन सिंह को गाली-गलौज कर वहां से जबरन ले कर चला गया था.
16 अगस्त 2009 को मुनमुन का शव नगर थाना क्षेत्र के अमघट्टा गांव से बरामद हुआ था. प्राथमिकी में मृतक के भाई अमरनाथ सिंह द्वारा यह बताया गया कि वह निबंधन कार्यालय पहुंच कर कातिब से कह कर निबंधन रूकवा दिया था. सीआईडी ने अपने जांच रिपोर्ट में सवाल उठाया था कि 14 से 16 अगस्त के बीच आखिर मुनमुन कहां था. इस पर जांच की अनुशंसा की गयी थी. 29 अगस्त 2009 को महज 12 दिन बाद तत्कालीन सदर डीएसपी द्वारा अमरनाथ के चचेरे भाई व भतीजा क्रमश:
राज शेखर सिंह व राहुल कुमार के बयान के आधार पर मुनमुन को जहर देकर हत्या की बात को सत्य करार देकर जांच प्रतिवेदन एसपी के पास भेज दिया गया. हालांकि डीएसपी निबंधन कार्यालय के कातिब का बयान नहीं लिया गया था. तत्कालीन एसपी द्वारा प्रतिवेदन 2 में डीएसपी की जांच रिपोर्ट को गलत मानते हुए भेसरा को जांच में भेजने व मामले की गहराई से जांच करने का आदेश दिया गया था.
वर्षों बाद आयी भेसरा की जांच रिपोर्ट : भेसरा की जांच रिपोर्ट 2 साल 8 माह बाद आया. भेसरा जांच रिपोर्ट आने के बाद एक बार फिर से तत्कालीन डीएसपी संजय कुमार द्वारा जांच शुरू की गयी. 29 अक्तूबर 2012 को डीएसपी ने जांच पूरी कर एसपी को रिपोर्ट सौप दिया. रिपोर्ट में सल्फास को मौत का कारण बताते हुए घटना को सत्य करार दिया गया था. डीएसपी के जांच प्रतिवेदन के आलोक में तत्कालीन एसपी पंकज सिन्हा द्वारा प्रतिवेदन 5 लिखा गया,
जिसमें घटना को सत्य करार देते हुए अभियुक्तों की गिरफ्तारी व कुर्की की कार्रवाई का आदेश दिया गया. इसी बीच, अभियुक्त नरेश ठाकुर की पत्नी की शिवचर्चा के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता उमेश कुमार सिंह से मुलाकात हुई और पीड़िता ने उमेश को आपबीती बतायी. उमेश ने सभी कागजातों को जुटाया व उसका अवलोकन करने के बाद तत्कालीन आईजी गुप्तेश्वर पांडेय से मिल कर इंसाफ की मांग की.
आइजी ने डीआइजी को दिया था जांच का निर्देश : 15 अप्रैल 2013 को आइजी द्वारा डीआइजी अमृत राज को अपने स्तर से जांच करने का आदेश दिया गया. 27 अप्रैल 13 को डीआइजी द्वारा एसपी को पुर्नजांच का आदेश दिया गया. डीआइजी द्वारा इस बीच एसपी को 4-5 पत्र भेज कर जांच रिपोर्ट देने को कहा गया,
लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी. 27 जुलाई 13 को उमेश पटना जाकर अभियुक्त नरेश ठाकुर के भाई गोविंदो ठाकुर से डीजीपी अभयानंद व बिहार मानवाधिकार आयोग को आवेदन दिलवा कर इंसाफ की मांग की. तब डीजीपी ने पीड़ित के सामने ही स्थानीय एसपी को मोबाइल पर मामले की फिर से जांच करने का आदेश दिया. 24 जुलाई 13 को मामले में आरोपित व निबंधन कार्यालय में गवाह बनने के लिए गये कामेश्वर पासवान व गुगली पासवान को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. गिरफ्तारी के बाद सामाजिक कार्यकर्ता उमेश कुमार सिंह फिर पटना गये और डीजीपी से मिल कर गिरफ्तारी वाली
बात बतायी.
मुनमुन हत्याकांड
मामले में आया नया मोड़
एसपी ने नगर थानाध्यक्ष को सौंपा जांच का जिम्मा
14 बिंदुओं पर फिर से की जा रही जांच
विधायक से निराशा हाथ लगी
डीजीपी के जबाव से क्षुब्ध होकर वह एक विधान पार्षद व एक विधायक के पास पहुंचा. दोनों से निराशा हाथ लगी. तब उमेश ने अमरनाथ सिंह से बात की और अभियुक्तों को बेकसूर बताते हुए माफी दे देने का आग्रह किया, लेकिन अमरनाथ सिंह उमेश को यह कह कर माफी देने से मना कर दिया कि सब कुछ भगवान की मरजी से हो रहा है. अमरनाथ की इस बात से उमेश को काफी ठेस पहुंची. उसने एक बार फिर इंसाफ के लिए लड़ने की ठानी. उधर, बिहार मानवाधिकार आयोग द्वारा भी डीआईजी को अपने स्तर से जांच का आदेश देकर फाईल बंद कर दिया गया था. फिर भी उमेश ने हार नहीं मानी.
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