सपूतों ने हिला दी थी अंगरेजी सत्ता की नींव

Updated at : 08 Aug 2013 4:19 AM (IST)
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सपूतों ने हिला दी थी अंगरेजी सत्ता की नींव

शिवहरः 1600 ई में इस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के साथ हाथ जोड़ कर आने वाला अंग्रेज जब हमारे देश का शासक बन बैठा, तब हम उसकी इच्छा के अनुसार नाचने लगे. लेकिन जब हमारा स्वाभिमान जागृत हुआतो हमने अंगरेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन शुरू किया. इस आंदोलन में शिवहर के सपूतों […]

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शिवहरः 1600 ई में इस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के साथ हाथ जोड़ कर आने वाला अंग्रेज जब हमारे देश का शासक बन बैठा, तब हम उसकी इच्छा के अनुसार नाचने लगे. लेकिन जब हमारा स्वाभिमान जागृत हुआतो हमने अंगरेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन शुरू किया. इस आंदोलन में शिवहर के सपूतों ने भी अपनी वीरता से अंग्रेजी सत्ता की नींव हिला दी.

शिवहर में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध आंदोलन का बिगुल महुअरिया निवासी ठाकुर नवाब सिंह व ठाकुर रामनंदन सिंह ने फूंका था. 1905 में बंग-भंग से सारे भारत में राजनीतिक चेतना जागी. उस समय ठाकुर नवाब सिंह महकमे के सिलसिले में कोलकात्ता आते जाते थे. उस समय बिहार उच्च न्यायालय से ठाकुर साहब काफी प्रभावित हुए. वे खुदीराम बोस की बहादुरी से भी प्रभावित थे. 1914 में चंदा इक ट्ठा कर ठाकुर नवाब सिंह ने गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में चंदा भेजा. 1917 में जब गांधी जी चंपारण आये तो ठाकुर साहब ने उनसे मुलाकात की व गांधी जी से काफी प्रभावित हुए. 1921 में जनवरी में असहयोग आंदोलन के सिलसिले में पहली बार गिरफ्तार हुए.

नागपुर कांग्रेस से लौटने के बाद ठाकुर रामनंदन सिंह ने असहयोग आंदोलन को गति दी. इस सिलसिले में पहली आमसभा शिवहर के हजारीबाग नामक स्थान पर हुई. इसमें ठाकुर नवाब सिंह, विंदेश्वर प्रसाद वर्मा, राम नवमी प्रसाद व ठाकुर रामनंदन सिंह ने अपने विचार रखे. इससे प्रभावित होकर शिवहर मध्य विद्यालय के शिक्षक फतहपुर निवासी रामनंदन सिंह, माधोपुर सुंदर निवासी हरिहर प्रसाद वर्मा, रेजमा निवासी भरत पांडेय ने बहुत से विद्यार्थियों के साथ स्कूल से त्यागपत्र दे दिया. वहीं सीतामढ़ी के शिक्षक जानकी प्रसाद वर्मा ने भी अपने पद से त्याग पत्र दे दिया. इससे अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिल गयी. जनवरी 1921 को बिहार-उड़ीसा सरकार के मुख्य सचिव जी रैनी ने प्रांत के सभी कलक्टर के नाम गश्ती पत्र जारी किया. इसमें कलक्टरों व मजिस्ट्रेटों को आंदोलन को दबाने का निर्देश दिया गया.

इधर, 25 जनवरी को ही मेजरगंज के डिहठी गांव में सभा करते समय ठाकुर रामनंदन सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. तत्कालीन एसडीओ ने मुकदमे की सुनवाई की और 1914 के डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के अंतर्गत उन्हें छह माह की सजा सुनायी गयी. ठाकुर नवाब सिंह के वंशज ठाकुर नवाब सिंह द्वितीय को भी गिरफ्तार कर लिया गया. इसके कुछ ही दिनों के अंतर पर अदौरी निवासी नंदलाल झा, खैरवा दर्प निवासी मथुरा प्रसाद सिंह गिरफ्तार कर लिये गये. 30 सितंबर 1921 में विदेशी वस्त्र का बहिष्कार का निर्णय लिया गया. इसमें ठाकुर नवाब सिंह ने गोला की सभी विदेशी वस्त्र आग के हवाले कर दी. लाहौर कांग्रेस के अधिवेशन में लिये गये निर्णय के आलोक में 26 जनवरी 1930 को ठाकुर रामनंदन सिंह ने सीतामढ़ी व विंदेश्वरी प्रसाद ने शिवहर में झंडा फहराया. 22 मार्च 1930 को पूर्व निश्चय के अनुसार, नमक कानून को भंग करने के लिए गांधी जी ने ऐतिहासिक यात्र दांडी मार्च शुरू की, जिसने अंग्रेजी सत्ता की बेचैनी बढ़ा दी. 13 अप्रैल 1930 को शिवहर में नमक सत्याग्रह की तिथि तय की गयी. कांग्रेस आश्रम से सटे महंत उदित नारायण दास से चार कट्ठा जमीन खरीदी गयी. राष्ट्रीय स्कूल को सत्याग्रह शिविर बनाया गया. दिन के एक बजे सभी लोग हजारी बाग नामक स्थान पर एकत्रित हुए. तीन बजे नमक बनाने का काम शुरू हुआ.

नमक जैसे ही बना पुलिस ने जनकधारी प्रसाद, ठाकुर रामनंदन सिंह, रामदयालु सिंह व नवाब सिंह समेत अन्य को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें शिवहर थाना लाया गया और रात में उन्हें बेलसंड के रून्नीसैदपुर ले जाया गया, जहां एक बगीचे में मुकदमे की सुनवाई की गयी और रामनंदन सिंह को डेढ़ साल व नवाब सिंह को छह माह की सजासुनाई गयी.

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