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शहीद गोपी साह के पुत्र जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर

Updated at : 30 Jan 2018 5:38 AM (IST)
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शहीद गोपी साह के पुत्र जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर

नानपुर : देश को आजादी दिलाने के लिए जान कुर्बान करनेवालों में नानपुर प्रखंड के बेहरा जाहिदपुर गांव के गोपी साह उर्फ सहदेव साह का नाम भी शामिल है, लेकिन आज उनके पुत्र जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. ग्रामीण छेदी भगत, गौतम कक्कड़ व समीउल्लाह समेत अन्य लोगों ने बताया कि 1942 के […]

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नानपुर : देश को आजादी दिलाने के लिए जान कुर्बान करनेवालों में नानपुर प्रखंड के बेहरा जाहिदपुर गांव के गोपी साह उर्फ सहदेव साह का नाम भी शामिल है, लेकिन आज उनके पुत्र जिल्लत की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

ग्रामीण छेदी भगत, गौतम कक्कड़ व समीउल्लाह समेत अन्य लोगों ने बताया कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में पुपरी, टावर चौक के समीप अंग्रेज दारोगा अर्जुन सिंह व आजादी के जाबांज सिपाहियों के बीच युद्ध छिड़ गया था. उस समय गोपी साह उर्फ सहदेव साह जवान थे और गुलामी के पीड़ा से आहत थे. स्थिति की भयावहता को देखते हुए गोपी साह बिना किसी भय व चिंता के लड़ाई में कूद पड़े. कई अंग्रेजी सिपाहियों को मार गिराया. इसी बीच दारोगा अर्जुन सिंह ने अपनी पिस्तौल से छह गोली गोपी के सीने में उतार दी, जिसमें गोपी साह शहीद हो गये.
परिवार चलाने के लिए मजदूरी करने की मजबूरी : शत्रुघ्न साह बताते हैं कि छोटी उम्र में ही पिताजी शहीद हो गए. गरीबी व लाचारी के चलते सही तरीके से पढ़ाई-लिखाई नहीं हो पाई. मां के पेंशन व मजदूरी के सहारे जीवन गुजारते रहे. शादी के बाद चार पुत्री व दो पुत्र का पेट चलाने के लिए मजदूरी करते हैं. सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं मिली. शत्रुघ्न साह ने बताया कि गांव में बहुत सारे लोगों को प्रधानमंत्री आवास व वृद्धा पेंशन मिलता है, पर अभी तक इसका लाभ नहीं मिल पाया है. जबकि, उनकी उम्र 64 साल है और गरीबी रेखा के अंदर भी आते हैं.
मुजफ्फरपुर में टावर पर लगे शहीदों की सूची में दर्ज है नाम ग्रामीणों का कहना है कि अन्य शहीदों के नाम स्मारक बनाया गया, लेकिन आज तक गोपी साह के नाम पर कहीं कोई स्मारक नहीं बनाया जा सका. जबकि, मुजफ्फरपुर स्थित टावर पर लगी शहीदों की सूची में इनका नाम भी दर्ज है. हालांकि, डीएम ने 10 दिसंबर 2007 को उनके पुत्र शत्रुघ्न साह को शहीद उत्तराधिकारी का परिचय-पत्र निर्गत किया, लेकिन अब तक कोई लाभ नहीं मिल सका है. ग्रामीण बताते हैं कि आजादी के बाद जब स्वतंत्रता सेनानियों की विधवाओं को पेंशन देने की बात आयी, तो लंबी लड़ाई के बाद गोपी साह की विधवा सनेहिया देवी को पेंशन मिलना शुरू हुआ. वर्ष 1998 तक उन्हें पेंशन मिलता रहा. उनके मृत्यु के बाद उनके बच्चे बेसहारा हो गए.
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