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कारगिल शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी हो गये बेगाने

Updated at : 26 Jul 2017 4:21 AM (IST)
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कारगिल शहीद मेजर चंद्रभूषण द्विवेदी हो गये बेगाने

शिवहर : केंद्र सरकार के किसान विरोधी नीति के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 26 जुलाई को जिला मुख्यालय पर धरना देगी . महामंत्री शत्रुघ्न साहनी ने बताया कि कृषि उपयोग में आनेवाली सामग्रियों की लागत मूल्य कम करने, कृषि उत्पाद के गिरते मूल्य को रोकने, भूमि सुधार कानून लागू करने, बेघरों को 10 डिसमिल जमीन […]

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शिवहर : केंद्र सरकार के किसान विरोधी नीति के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 26 जुलाई को जिला मुख्यालय पर धरना देगी . महामंत्री शत्रुघ्न साहनी ने बताया कि कृषि उपयोग में आनेवाली सामग्रियों की लागत मूल्य कम करने, कृषि उत्पाद के गिरते मूल्य को रोकने, भूमि सुधार कानून लागू करने, बेघरों को 10 डिसमिल जमीन देंगे एवं मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2014 में संशोधन वापस लेने, को लेकर धरना प्रदर्शन किया जा रहा है.

पुरनहिया. इस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान है आंखें . इस मुल्क के प्रत्येक बाशिंदा अपने हर शोहदा के जज्बे को सलाम करता है, जिन्होंने अपनी सरजमीं के खातिर अपनी जान तक की कुर्बानी दे दी. इन्हीं शहादत प्राप्त करने वालों में से हैं मेजर चंद्र भूषण द्विवेदी . जिन्होंने ऑपरेशन विजय के दौरान अपनी वीरता का प्रदर्शन कर मिसाल कायम करते हुए भारत भूमि की रक्षा के लिए मौत को गले लगा लिया .

प्रखंड के चंडीहा निवासी मेजर द्विवेदी का जन्म दो जनवरी 1961 को हुआ था. बिंदेश्वरी द्विवेदी व स्वर्गीय इंद्रासन देवी के तीन बच्चे-बच्चियों में सबसे छोटे थे. पिता किसान व माता कुशल गृहिणी थी. प्रारंभिक शिक्षा पैतृक गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में कक्षा चार तक हुई उसके बाद कक्षा छह तक की पढ़ाई मध्य विद्यालय बेलसंड से की . तत्पश्चात सैनिक स्कूल तिलैया में इनका चयन हुआ और जुलाई 1970 से 1977 तक वही अध्ययनरत रहते हुए उच्च शिक्षा प्राप्त की.विलक्षण प्रतिभा के धनी इस बालक ने 24 जनवरी 1978 को नेशनल डिफेंस एकेडमी के लिए चयनित हुए. इसके बाद प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी स्कूल खड़कवासला पूना चले गये . यहां पर श्री द्विवेदी ने एक्सीलेंट का प्रमाण पत्र हासिल की .इसके पश्चात उन्हें इंडियन मिलिट्री एकेडमी देहरादून जाना पड़ा . प्रशिक्षण उपरांत जून 1982 में कमीशन प्राप्त कर सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में योगदान दिया . तदुपरांत प्रोन्नति पाकर लेफ्टिनेंट,कैप्टन और मेजर बन गये.

इस बीच सीतामढ़ी जिला के बेला विरार निवासी वकील महावीर चौधरी के सबसे छोटी बच्ची भावना द्विवेदी के साथ 10 मार्च 1985 को वैवाहिक बंधन में बंध गये . इनकी दो पुत्रियां नेहा एवं दीक्षा है. अपने कर्तव्य के प्रति कटिबद्धता छायांकन बागवानी व समाज के हर वर्ग एवं आयु के लोगों के बीच समन्वय की भावना के साथ जन-जन में राष्ट्रप्रेम का भाव जागृत करना उनका हॉबी था . राष्ट्रीयता की भावना उनके अंदर इस कदर बैठी थी की एक बार पिता द्वारा कहे जाने पर कि मेरे मेरा जी चाहता है तू काफी दिन तक देश की सेवा की अब सिविलियन नौकरी कर मेरे साथ रहो. प्रत्युत्तर में मेजर द्विवेदी ने कहा था असैनिक सेवा और मैं ? असंभव . मेरा जीवन तो अपनी मातृभूमि के सरजमीं से सरहद एवं वतन के लिए समर्पित है. किसी ने यह भी नहीं सोचा होगा कि मार्च 1999 की होली परिवार व समाज के साथ उनकी आखिरी होगी. जब वे इस दौरान गांव आये हुए थे. इन्हीं दिनों द्रास व कारगिल इलाके में घुसी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय की शुरुआत हुई थी. फिर दो जुलाई 1999 को इस अभियान का हिस्सा बने मेजर द्विवेदी ने दुश्मनों की गोली से घायल होने के बावजूद सामने खड़े सभी घुसपैठियों को मौत की नींद सुला कर भारत माता का यह सपूत हमेशा के लिए शहीद होकर अपनी मां के आंचल में सो गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा शहीदों के सम्मान में उनके गांव व शिक्षा वाले स्कूल को शहीद के नाम पर नामकरण करने की बात कही थी. तत्कालीन जिलाधिकारी के पी मंडल ने शहीद के नाम पर गांव में सामुदायिक भवन, बसंतपट्टी चौक पर स्मारक द्वार एवं मेजर साहब की मूर्ति स्थापित करने तथा शिक्षा वाले विद्यालय को जिला स्थापना समिति की बैठक में प्राथमिक से मध्य में उत्क्रमित कर नामकरण करने की बात कही थी. परंतु सारी योजनाएं धरी की धरी रह गयी. शहीद के अग्रज सेवानिवृत्त शिक्षक श्याम सुंदर द्विवेदी इन सभी बातों को लेकर प्रशासन से जनप्रतिनिधियों तक पर खासे नाराज दिखे.

और कहा कि इसको लेकर सभी से आग्रह करने के बावजूद किसी ने सकारात्मक पहल नहीं की. सामुदायिक भवन के लिए जमीन उपलब्ध कराने के बाद निर्माण तो हुआ तथा तत्कालीन विधायक अजीत कुमार झा के मद से स्मारक बनवाये गये पर इन सब की हालत किसी से छुपी हुई नहीं है. यहां प्रशासनिक पदाधिकारी सिर्फ 15 अगस्त एवं 26 जनवरी को पहुंच कर अपनी फॉर्मेलिटी तो अदा कर लेते हैं, लेकिन इन सबों के द्वारा किये गये वादे आज तक पूरा नहीं हो पाया. वही शहीद परिवार का यह भी मानना है कि उनके सम्मान में किया जाने वाला कोई भी काम आज तक पूरा नहीं हो पाया. जब की सीतामढ़ी और शिवहर जिला में जनप्रतिनिधि निधि के अलावे राज्य एवं केंद्र के मंत्री सहित मुख्यमंत्री भी कई बार आ चुके हैं लेकिन स्मारक स्थल एवं इस गांव के लोगों की सुधि लेने की फुरसत किसी को नहीं

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