मुजफ्फरपुर की शाही लीची पर क्लाइमेट चेंज की मार, मंजर की जगह निकल रहे पत्ते

फाइल फोटो:
Shahi Litchi: मुजफ्फरपुर की मशहूर लीची इस बार मौसम की मार झेल रही है. बढ़ते तापमान के कारण लीची के पेड़ों में जहां मंजर निकलना चाहिए था, वहां नए पत्ते निकलने लगे हैं. इस बदलाव ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इसका सीधा असर उत्पादन और क्वालिटी पर पड़ सकता है.
Shahi Litchi: विश्व प्रसिद्ध मुजफ्फरपुर की शाही और चाइना लीची के शौकीनों को इस साल लीची के बागों में वह चिर-परिचित लाली शायद कम नजर आ रही है, क्योंकि कुदरत के बदलते मिजाज ने पेड़ों का गणित बिगाड़ दिया है.
चिलचिलाती धूप और बढ़ते पारे के कारण लीची के पेड़ों में मंजर (फूल) आने के बजाय नई पत्तियां निकल रही हैं.
मंजर की जगह पत्ते, उत्पादन पर खतरा
इस साल शाही और चाइना दोनों प्रमुख किस्मों में असामान्य बदलाव देखने को मिल रहा है. शाही लीची के करीब 25 प्रतिशत और चाइना किस्म में लगभग 50 प्रतिशत पेड़ों में मंजर की जगह पत्ते निकल आए हैं. यह स्थिति उत्पादन के लिहाज से चिंताजनक मानी जा रही है.
स्थानीय किसानों का कहना है कि पिछले साल भी कुछ हद तक ऐसा हुआ था, लेकिन इस बार स्थिति ज्यादा गंभीर नजर आ रही है.
25 साल बाद प्रकृति का ऐसा धोखा
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (NRCL) के आंकड़ों ने वैज्ञानिकों और किसानों को चौंका दिया है. पिछले 25 वर्षों में पहली बार नवंबर और दिसंबर के महीनों में तापमान सामान्य से 2 डिग्री अधिक रहा. नतीजा यह है कि शाही लीची के 25 प्रतिशत और चाइना किस्म के करीब 50 प्रतिशत पेड़ों में मंजर के बदले हरे पत्ते निकल आए हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है.
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के विशेषज्ञों के अनुसार, लीची के लिए नवंबर से जनवरी के बीच का समय बेहद अहम होता है. इस दौरान तापमान कम रहना चाहिए, लेकिन इस बार नवंबर और दिसंबर में तापमान सामान्य से अधिक रहा. यही वजह है कि पेड़ों में मंजर बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई.
स्प्रे से बचें, नमी का रखें ध्यान
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. विकास दास ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है. उन्होंने कहा है कि जिन पेड़ों में अभी मंजर निकल रहे हैं, उन पर किसी भी तरह के कीटनाशक या रसायनिक स्प्रे का इस्तेमाल बिल्कुल न करें.
किसानों को सलाह दी गई है कि वे बागों में हल्का पानी पटवन जारी रखें ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे. गर्मी बढ़ने पर फव्वारा सिंचाई का उपयोग करने को कहा गया है ताकि पेड़ों का तापमान नियंत्रित रहे.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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