चलायी गयी थीं ढाई सौ चक्र गोलियां
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :30 Mar 2016 8:07 AM (IST)
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फ्लैश बैक. 14 वर्ष पूर्व आज के दिन 48 घंटे तक कैदियों के कब्जे में था छपरा जेल 14 वर्ष पूर्व आज ही के दिन छपरा जेल ब्रेक होने से बचाने व कारा में अपराधी गतिविधियों पर लगाम लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले पुलिस पदाधिकारी व जवान अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं. कुछ […]
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फ्लैश बैक. 14 वर्ष पूर्व आज के दिन 48 घंटे तक कैदियों के कब्जे में था छपरा जेल
14 वर्ष पूर्व आज ही के दिन छपरा जेल ब्रेक होने से बचाने व कारा में अपराधी गतिविधियों पर लगाम लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले पुलिस पदाधिकारी व जवान अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं. कुछ अपराधी प्रवृत्ति के बंदियों व पुलिस के बीच हुई कम-से-कम ढाई सौ चक्र फायरिंग में छह अपराधिक प्रवृत्ति के बंदियों के मारे जाने व पुलिस पदाधिकारियों के जख्मी होने के बाद जिले में तत्कालीन पुलिस पदाधिकारी की दबी जुबान आम जनों ने सराहना भी कि परंतु, उन्हें सरकार से कभी इस मामले में सराहना की कौन कहे तवज्जों तक नहीं मिली.
संग्राम/राजीव रंजन
छपरा (सदर) : 14 वर्ष पूर्व हुई इस घटना में शामिल पुलिस पदाधिकारियों व जेलकर्मियों को अब एक मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से गवाही के लिए बुलाया गया है. इस मामले में तत्कालीन प्रभारी काराधीक्षक विपिन कुमार सिंह ने विभिन्न अापराधिक प्रवृत्ति के बंदियों के विरुद्ध अलग-अलग धाराओं में चार अलग-अलग प्राथमिकियां भगवान बाजार थाने में दर्ज करायी थीं.
विभागीय जानकारी के अनुसार 28 मार्च से 30 मार्च, 2002 से 48 घंटे से ज्यादा समय तक मंडल कारा को बंदियों के कब्जे से मुक्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले तत्कालीन पुलिस कप्तान व वर्तमान में पटना के पुलिस महानिरीक्षक कुंदन कृष्णन एवं उनके सहयोगी पुलिसकर्मियों को आम जनों ने भी सराहा. यही नहीं मनबढु बंदियों की कारगुजारियों पर रोक लगाने व कानून का राज्य स्थापित करने वालों पर इन पुलिस पदाधिकारियों को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के झुठे मुकदमों का भी सामना करना पड़ा.
जिले में अापराधिक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए अपनी जान की परवाह किये बिना लड़ने वालों इन पदाधिकारियों को अपने विभाग या अन्य विभागों के तत्कालीन वरीय पदाधिकारियों ने पीठ भी ठोकी थी. परंतु, जेल ब्रेक होने से बचाने व कानून की धज्जियों उड़ानेवालों के खिलाफ अपने कर्तव्य का ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करनेवाले इन पदाधिकारियों को प्रशंसा पत्र देने या दिलाने की जरूरत न तो विभाग ने और न सरकार ने समझी. यही नहीं इस मामले का पर्यवेक्षण करनेवाले तत्कालीन प्रमंडलीय आयुक्त पंचम लाल, डीआइजी एमए काजमी, डीएम पंकज कुमार आदि के स्तर से भी मौखिक आश्वासन तो मिला, परंतु खास रुचि इन जांबाजों के प्रोत्साहन के लिए नहीं दिखायी दी.
हत्या, लूट सहित दर्जनों मामलों में वांछित थे छह मृत अपराधी बंदी : पुलिस फाइल के अनुसार 30 मार्च, 2002 को फायरिंग में मारे गये अपराधियों में शशिभूषण सिंह पर विभिन्न थानों में चार, अशोक उपाध्याय पर छह, संजय राय पर 13, वकील राय पर 12, अक्षयवर सिंह प्रसाद, रंजीत सिंह पर एक मुुकदमा दर्ज था, जिनकी छपरा कारा में अपनी मनमानी चलने की बात पुलिस की फाइल बताती है.
कारा प्रशासन ने चार प्राथमिकियां करायी थीं दर्ज : मंडल कारा के तत्कालीन काराधीक्षक विपिन कुमार सिंह ने 30 मार्च ,2002 की जेल में फायरिंग में छह बंदियों के मारे जाने के मामले में एक सप्ताह पूर्व से लेकर घटना के दिन तक की चार प्राथमिकियां दर्ज करायी थीं. ये प्राथमिकियां भगवान बाजार थाना कांड संख्या 42/2002, 43/2002, 46/2002 तथा 47/2002, 17 मार्च से लेकर 30 मार्च 2002 के बीच करायी थीं, जिसमें दबंग बंदियों की गुटबाजी की वजह से मनमाने ढंग से नियम के खिलाफ गेट के अंदर मुलाकात का विवाद, खाद्य सामग्री पर कब्जा, प्रशासनिक पदाधिकारियों एवं पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों पर पथराव, फायरिंग, बम विस्फोट, जेल पर कब्जा, महिला बंदियों समेत अन्य बंदियों के खाने पर पाबंदी लगाने समेत विभिन्न आरोप 12 नामजद अपराधी बंदियों तथा अन्य अज्ञात के विरुद्ध दर्ज कराये गये थे. यही नहीं मारे गये अपराधियों में से चार के परिजनों ने भी छपरा न्यायालय में वाद दर्ज करा कर तत्कालिक एसपी कुंदन कृष्णन समेत दर्जनों पुलिस पदाधिकारियों पर हत्या आदि के आरोप लगाया गये थे. जिनमें तीन मामले तो छपरा कोर्ट में ही प्रारंभिक जांच में असत्य करार दिये गये. वहीं अशोक उपाध्याय के परिजनों का मामला पटना में उच्च न्यायालय में जाकर असत्य करार दिया गया.
घटना के दिन 1.30 बजे के बाद प्रशासन के सारे प्रयास को धत्ता बताते हुए बंदियों द्वारा जेल ब्रेक कर भागने का प्रयास, फायरिंग, पथराव, बमबमारी व दीवार तोड़ने के असफल प्रयास के बाद अंतत: तत्कालीन एसपी कुंदन कृष्णन ने फायर ब्रिगेड के सीढ़ी के सहारे जेल के मुख्य द्वार से दक्षिण की दीवार पर चढ़ कर बंदियों पर काबू पाने का जब प्रयास शुरू किया तो देखते-ही-देखते उनके अन्य जाबांज पुलिस पदाधिकारी, ट्रेनी डीएसपी हरिमोहन शुक्ला, मुफस्सिल थानाध्यक्ष निरंजन तिवारी, मढ़ौरा थानाध्यक्ष विनोद कुमार, सोनपुर थानाध्यक्ष अर्जुन लाल, राजेंद्र कुमार दुबे व एसपी के चालक जितेंद्र कुमार सिंह दीवार पर चढ़ गये. इसके बाद मनबढ़ु बंदियों द्वारा लगातार फायरिंग व बमबारी व पथराव शुरू कर दिया गया. इसके बाद पुलिस ने भी कम-से-कम दो चक्र हवाई फायरिंग व 80 आंसु गैस के गोले फेंके, बावजूद बंदी अपने वार्डों में जाने के बदले फायरिंग व बमबारी करते रहे.
यही नहीं मुख्य द्वार पर प्रशासन व पुलिस के प्रवेश को रोकने के लिए बंदियों द्वारा गैस से भरे सिलिंडर जमा कर दिये गये थे. उनकी योजना छपरा जेल के मुख्य गेट को उड़ाने की बतायी जाती थी. ऐसी स्थिति में एक योजना के तहत प्रशासन ने गैस कटर से मुख्य गेट के एक हिस्से को काटा और तब सभी पुलिस पदाधिकारी परिसर में घुसे, बावजूद बंदियों ने अपने वार्डों में जाने के बदले जेलकर्मियों को घेर कर उन पर वार शुरू कर दिया. ऐसी स्थिति में आत्मरक्षार्थ पुलिस ने कम से 34 राउंड प्रभावी फायरिंग की. इस दौरान पुलिस व बंदियों के बीच फायरिंग में कम से कम 30 पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों के जख्मी होने के साथ-साथ छह बंदियों के तत्काल या इलाज के दौरान मौत की खबर से राज्य ही नहीं पूरे देश स्तर पर छपरा जेल चर्चा में आ गया.
बंदियों की मनमानी व जिद थी फायरिंग की वजह
बिहार सरकार के कारा विभाग द्वारा 27 मार्च, 2002 को पत्र भेज कर जेल में बंद अपराधियों वकील राय, संजय राय, शशिभूषण सिंह, जटा शंकर सिंह को केंद्रीय कारा भागलपुर तथा बक्सर में स्थानांतरण का आदेश दिया गया था. इस सूचना के पूर्व 17 मार्च, 22 मार्च तथा 24 मार्च को कभी बंदियों की मुलाकाती तो कभी खाना वितरण को लेकर मनमानी करने वाले बंदियों में नाराजगी थी. इसके अलावा ये बंदी किसी भी स्थिति में छपरा जेल से बाहर नहीं जाने तथा अन्य बंदियों को भड़का कर प्रशासन व पुलिस के खिलाफ कथित रूप से हमले के लिए उकसाने से बाज नहीं आ रहे.
जैसा कि दर्ज मामलों में इंस्पेक्टर, एसपी व डीआइजी की पर्यवेक्षण की रिपोर्ट बताती है. हालांकि प्रशासन द्वारा हर हाल में घटना को प्रयास किया गया था. यही नहीं तत्कालीन सांसद प्रभुनाथ सिंह, बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री उदित राय द्वारा भी बंदियों को समझा-बुझा कर जिद छोड़ने का आग्रह किया गया था. परंतु, बंदी किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे.
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