लाल बालू से बन रहा ‘उजला भविष्य’

Published at :21 Aug 2015 11:22 PM (IST)
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लाल बालू से बन रहा ‘उजला भविष्य’

उत्साहजनक : करोड़ों रुपये का हो रहा कारोबार, संवर रही सैकड़ों की जिंदगी दिघवारा : गंगा के जल स्तर में वृद्धि होने के कारण लाल बालू के व्यापार की रफ्तार तेज हो गयी है एवं बालू व्यापार से जुड़े नाव मालिकों, व्यापारियों व मजदूरों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है. दिघवारा प्रखंड अधीन क्षेत्र […]

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उत्साहजनक : करोड़ों रुपये का हो रहा कारोबार, संवर रही सैकड़ों की जिंदगी
दिघवारा : गंगा के जल स्तर में वृद्धि होने के कारण लाल बालू के व्यापार की रफ्तार तेज हो गयी है एवं बालू व्यापार से जुड़े नाव मालिकों, व्यापारियों व मजदूरों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है.
दिघवारा प्रखंड अधीन क्षेत्र के बोधा छपरा से लेकर झौंवा गांव तक के गंगा का तटीय इलाका इन दिनों लाल बालू की खरीद-बिक्री का बिजनेस जोन बन गया है.
राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 19 से दक्षिण दिशा में अवस्थित इस क्षेत्र में बालू उद्योग से जुड़े लोगों की भीड़ दिन भर दिखती है. बालू का कारोबार एक तरफ जहां हजारों लोगों को रोजगार का अवसर मुहैया करवा रहा है, वहीं करोड़ों रुपये का व्यवसाय होने से लोगों की आर्थिक दशा बेहतर हो रही है.
1995 से शुरू है बालू का कारोबार : जिले में पहलेजा व डोरीगंज में बालू का व्यवसाय होता था. इसके बाद वर्ष 1995 में झौंवा गांव के पास बांध-बांधे जाने के बाद यहां बालू व्यवसाय शुरू हुआ. शुरुआत में वर्ष 2000 तक यह व्यवसाय रफ्तार नहीं पकड़ सका, क्योंकि उस समय तक घाट पर ट्रैक्टरों से बालू की बिक्री होती थी व एक नाव पर तीन से चार फुट ही बालू लादा जाता था.
वर्ष 2001 में इस व्यवसाय ने रफ्तार पकड़ी एवं 15 साल बाद आज यह व्यवसाय अपने चरम पर है. पांच हजार से अधिक लोगों की रोजी-रोटी कमाने का साधन बना है.
लगभग तीन किलोमीटर के इलाके में है विस्तार : गंगा नदी का जल स्तर जब काफी बढ़ जाता है, तब गंगा की ब्रांच लाइन आमी से झौंवा की ओर मुड़ जाती है एवं सावन की शुरुआत होते ही लगभग तीन किलोमीटर के इस तटीय क्षेत्र में प्रतिदिन सैकड़ों नावों से बालू उतरने का काम शुरू हो जाता है.
कोईलवर से आता है बालू : झौंवा, बोधा छपरा, संठा, गोराइपुर आदि विभिन्न गंगा घाटों से बड़ी नावें प्रतिदिन 20 से 30 मजदूरों के साथ बालू लाने के लिए रवाना होती हैं एवं सिंगही, हल्दी छपरा, बलवन टोला के रास्ते नाव सोन नदी के कोईलवर पुल के समीप पहुंचती हैं. लगभग इस 40 किलोमीटर की दूरी को पूरा करने में खाली नाव को चार घंटे का समय लगता है.
कोईलवर पहुंचने पर मजदूर रस्सी लगी लोहे की बाल्टियों से दो से तीन घंटे में बालू नाव में भर लेते हैं एवं दो से ढाई घंटे बाद पुन: बालू लदी नाव अपने घाट पहुंचती है, जहां मजदूर बालू की अनलोडिंग करते हैं.
फुट के हिसाब से लादा जाता है बालू : नाव पर बालू उसकी क्षमता व जगह के अनुसार फुट के हिसाब से लोड किया जाता है. एक नाव पर पांच से 15 फुट बालू लोड होता है.
कई जिलों के सैकड़ों मजदूर हैं कार्यरत : बालू लाने के लिए जिन सैकड़ों नावों का प्रयोग होता है, उन नावों पर सीजन भर बालू को चढ़ाने व उतारने के लिए स्थानीय मजदूर की जगह दूसरे कई जिलों के मजदूरों का प्रयोग किया जाता है.
ये मजदूर मोतिहारी, बेतिया, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, वैशाली, पटना समेत कई जिलों के होते हैं. बालू व्यवसाय बिहार के कई जिलों के हजारों मजदूरों को रोजगार का अवसर मुहैया कराता है. एक मजदूर प्रतिदिन दिन भर मेहनत करने पर पांच सौ से छह सौ कमा लेता है.
गंगा की धारा पर निर्भर है रोजगार : बालू का यह कारोबार गंगा के जल स्तर पर निर्भर करता है. जब झौंवा के समीप गंगा का पानी प्रवेश करता है.
तभी से बालू का कारोबार अपनी रफ्तार पकड़ लेता है. सावन व भादो में यह व्यवसाय अपने चरम पर होता है. जुलाई से नवंबर तक बालू की बिक्री होती है.
बालू व्यवसाय में प्रतिदिन करोड़ों का कारोबार होता है. क्योंकि दिन भर विभिन्न घाटों से ट्रकों व ट्रैक्टरों पर बालू को लाद कर बिहार के विभिन्न जिलों समेत पूर्वी उत्तरप्रदेश के कई इलाकों में भेजा जाता है.
लग जाती हैं कई अस्थायी दुकानें : जैसे ही बालू व्यवसाय शुरू होता है, इन घाटों पर अस्थायी दुकानें लगनी शुरू हो जाती है.
सीजन भर यहां होटल, सब्जी दुकान, किराना दुकान, हार्डवेयर दुकान, कपड़े की दुकान, मोबाइल रिपेयरिंग व रिचार्ज की दुकान, मांस व मछली बिक्री की दुकानें सजती हैं एवं दैनिक उपयोग का हर सामान मिलता है. इस कारण सैकड़ों लोगों को रोजगार का साधन मिल जाता है.
नावों पर होता है हर इंतजाम : जिन नावों पर बालू लाद कर लाया जाता है, उस पर बैठने, सोने, पकाने व खाने की पूरी व्यवस्था होती है. खाना बनाने के लिए बरतन व चूल्हा होता है, जिस पर सफर के क्रम में मजदूर खाना बना लेते हैं.
मजदूरों के मनोरंजन के लिए हर नाव पर बड़े लाउडस्पीकर लगे होते हैं, जिसमें बजनेवाले भोजपुरी व हिंदी गीत मजदूरों का मनोरंजन करते हैं. प्रत्येक नाव में 30 से 45 एचपी की क्षमता वाले दो या तीन सिलिंडर वाला इंजन लगा होता है, जिसके सहारे नावें चलती हैं.
सामूहिकता में काम, पंगत में भोजन
नाव से बालू खड़े करने के बाद सभी बालू मजदूर एक ही दुकान पर एक साथ बैठ कर क्षेत्र की/जाति की विषमता को भूलते हुए भोजन करते हैं, जो भाईचारे की भावना को बढ़ाता है.
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