अब स्कूलों में सुनाई नहीं पड़ती खेल की घंटी, उपेक्षित हैं खेल मैदान

Updated at : 06 Jan 2018 4:20 AM (IST)
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अब स्कूलों में सुनाई नहीं पड़ती खेल की घंटी, उपेक्षित हैं खेल मैदान

छपरा(नगर) : शिक्षा के साथ-साथ खेल भी जीवन का अभिन्न अंग होता है. प्रारंभिक स्तर पर यदि विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें सही ट्रेनिंग दी जाये तो छोटे शहरों के बच्चे भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं. कहने के लिए उपरोक्त वाक्य जिले के तमाम बड़े […]

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छपरा(नगर) : शिक्षा के साथ-साथ खेल भी जीवन का अभिन्न अंग होता है. प्रारंभिक स्तर पर यदि विद्यालयों में छात्र-छात्राओं की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें सही ट्रेनिंग दी जाये तो छोटे शहरों के बच्चे भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं. कहने के लिए उपरोक्त वाक्य जिले के तमाम बड़े अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों द्वारा सार्वजनिक मंच पर बोले जाते हैं, पर इन वाक्यों को धरातल पर लाकर प्रतिभाओं का विकास सारण जिले में कहीं भी नजर नहीं आता.

जिले के 70 प्रतिशत प्रारंभिक विद्यालयों में खेल को लेकर उदासीनता बरती जाती है. गत पांच वर्षों में अधिकतर विद्यालयों से खेल की घंटियां गौण होते जा रही हैं. तरंग जैसे सरकारी इवेंट में महज खानापूर्ति के लिए छात्रों का चयन तो कर लिया जाता है पर प्रतियोगिता समाप्त हो जाने के बाद अच्छा प्रदर्शन करने वाले छात्रों को न अलग से कोई ट्रेनिंग प्राप्त होती है और न ही उन्हें स्कूल लेबल पर ही कोई सुविधा मुहैया करायी जाती है. ऐसे में छात्रों में बौद्धिक विकास के साथ-साथ उनका शारीरिक विकास कर पाना संभव प्रतीत नहीं होता.

कोई तय शेड्यूल नहीं है

जिले के प्रारंभिक व माध्यमिक विद्यालयों में खेल शिक्षकों की नियुक्ति की गयी है. इन खेल शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि विद्यालय में प्रतिदिन प्रमुख खेल व शारीरिक के कार्यक्रम करायें और खेल की इन घंटियों में बेहतर करने वाले छात्रों को प्रॉपर ट्रेनिंग प्रदान करे. हालांकि इन खेल शिक्षकों का कार्य महज सामान्य पीटी व परेड कराने तक ही सिमट कर रह गया है. खेल को लेकर कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बनाया जाता. खेल की घंटी का कोई तय शेड्यूल भी नहीं है.

15 अगस्त या 26 जनवरी के पहले छात्रों को थोड़ा बहुत शारीरिक अभ्यास कराया जाता है. अन्य दिनों में खेल की घंटी के नाम पर महज खानापूर्ति होती है.

खेल मैदान भी हो गये उपेक्षित

गंडामन हादसे के बाद कई भवनहीन स्कूलों को एक ही बिल्डिंग में शिफ्ट कर दिया गया. जब कमरे कम पड़ने लगे तो खाली मैदान में नये कमरे बना दिये गये. जिले में कई ऐसे स्कूल भी हैं जहां दो से तीन सौ छात्रों की पढ़ाई भवन के अभाव में बरामदे में होती है या मंदिर व मठ में बगीचे में. छपरा शहर के जिला स्कूल, राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, ब्राह्मण स्कूल, बी सेमिनरी आदि प्रमुख स्कूलों के खेल मैदान उपेक्षा का शिकार हैं. जिला स्कूल का खेल मैदान कभी बड़े खेल आयोजनों का साक्षी रहा था जो अब डंपिंग जोन में तब्दील हो चुका है.

ग्रामीण स्तर पर छिपी हुई हैं प्रतिभाएं

ऐसा नहीं है कि जिले के सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों में प्रतिभा की कोई कमी है. स्कूल लेबल से अलग हटकर आयोजित होने वाली स्पोर्ट्स इवेंट में यही छात्र कई बार बेहतर प्रदर्शन कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं. ग्रामीण क्षेत्रों के प्रारंभिक व माध्यमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे स्वयं के प्रयासों व अपने अभिभावकों की मदद से जिले के कबड्डी, वॉलीबॉल, फुटबॉल, शतरंज, क्रिकेट आदि टूर्नामेंट में राज्य स्तर पर जिले का नाम रोशन कर चुके हैं.

यदि इन बच्चों को स्कूल लेबल पर सरकार द्वारा स्पोर्ट मिल सके तो निश्चित ही इनके अंदर की स्पोर्ट्समैन स्पिरिट देश और दुनिया में मुकाम कर सकता है.

क्या कहते हैं जिला शिक्षा पदाधिकारी

विद्यालयों में खेल से जुड़े कई कार्यक्रम चलाये जाते हैं. छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सके इसके लिए नियमित रूप से खेल व शारीरिक अभ्यास कराये जाते हैं. स्कूल के खेल मैदानों को व्यवस्थित किया जायेगा.

राजकिशोर सिंह , जिला शिक्षा पदाधिकारी, सारण

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