राशि नहीं मिलने से मेले में आ रही अड़चन
Updated at : 30 Oct 2017 2:56 AM (IST)
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छपरा (सारण) : कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा-सरयू के पवित्र संगम पर लगने वाले गोदना-सेमरिया मेले की तैयारी शुरू कर दी गयी है. मेले का उद्घाटन आगामी तीन नवंबर को किया जायेगा. इस मेले को राजकीय मेले का दर्जा प्राप्त है. लेकिन मेले के आयोजन के लिए सरकार की ओर से राशि उपलब्ध नहीं […]
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छपरा (सारण) : कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा-सरयू के पवित्र संगम पर लगने वाले गोदना-सेमरिया मेले की तैयारी शुरू कर दी गयी है. मेले का उद्घाटन आगामी तीन नवंबर को किया जायेगा. इस मेले को राजकीय मेले का दर्जा प्राप्त है.
लेकिन मेले के आयोजन के लिए सरकार की ओर से राशि उपलब्ध नहीं करायी गयी है. आजादी के पहले कोन्हिया बैलहट्टा पशु मेले के रूप में लगने वाले इस मेले को 1996 में राजकीय मेले का दर्जा प्राप्त हुआ. इस मेले में श्रद्धालुओं को सुविधा मुहैया कराने के लिए नगर विकास विभाग की ओर से ढाई लाख रुपये की राशि मुहैया करायी जाती थी, लेकिन वर्ष 2006 में इस मेले के लिए राशि का आवंटन रोक दिया गया. स्थानीय विधायक व कला संस्कृति मंत्री के प्रयास से कला संस्कृति व युवा कार्य विभाग ने आवंटन शुरू किया. बाद में स्थानीय विधायक के मंत्री पद से हटते ही आवंटन रोक दिया गया. इसके बाद से प्रत्येक वर्ष मेले के लिए राशि का आवंटन हासिल करने के लिए मेला समिति को काफी मगजमारी करनी पड़ रही है. इस वर्ष भी अब तक राशि का आवंटन नहीं किया गया है.
मेला प्राधिकार में नहीं मिला स्थान : राज्य का काफी प्राचीन मेला होने के बावजूद गोदना-सेमरिया मेले को बिहार राज्य मेला प्राधिकार में शामिल नहीं किया गया है.
इसी मेले के बाद के सारण जिले में हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला लगता है और पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में ददरी मेला लगता है. जिला मुख्यालय से महज 10 किमी की दूरी पर स्थित पैराणिक गोदना सेमरिया मेला काफी विख्यात है. वस्तुत: यह क्षेत्र आरण्यक संस्कृति का प्रतिबिंब है. सरयू नदी के तट पर यह स्थान ऋषि-मुनियों का साधना क्षेत्र रहा है. त्रेता युग में इसी स्थान पर महर्षि श्रृंगी के द्वारा कराये गये पुत्र्येष्टि यज्ञ के पश्चात ही प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ था. काशी के गंगा तट पर स्थित मंदिरों की शृंखला जहां सतयुग की महत्ता प्रकट करती है, वहीं यहां गोदना से सेमरिया तक मंदिरों की शृंखला इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता बयां करती है.
लगभग सात किमी में फैले इस क्षेत्र को देश भर में गौतम स्थान के नाम से जाना जाता है. वाल्मीकि रामायण में भी इस स्थान का विस्तृत उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि महर्षि गौतम ऋषि के शाप से पत्थर बनीं उनकी पत्नी अहल्या का उद्धार भगवान श्रीराम ने इसी स्थान पर आकर किया था. तब से कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां विशाल मेले के आयोजन की परंपरा चली आ रही है. इस दिन लोग यहां सरयू में स्नान के बाद मूली और सत्तू जरूर खाते हैं, किंतु दु:खद बात यह है कि धार्मिक रूप से इतना विख्यात होने के बाद भी यह स्थान विकास के मामले में दिन प्रति-दिन और पीछे ही होता जा रहा है.
भारतीय रेलवे ने समझा महत्व : इस स्थान के महत्व को रेलवे ने जरूर समझा है. महर्षि श्रृंगी, गौतम, अहिल्या, वीर हनुमान, अंजनी की कथा से जुड़े इस नगर में पड़ने वाले स्टेशन का नाम गौतम स्थान दर्ज है. इसी स्थान पर उतर कर लोग गोदना में स्थित महर्षि गौतम ऋषि आश्रम का दर्शन करने जाते हैं.
हनुमान जी का ननिहाल भी है गौतम स्थान : इस स्थान को वीर हनुमान का ननिहाल भी कहा जाता है. वीर हनुमान अंजनी के पुत्र हैं और अंजनी महर्षि गौतम ऋषि की पुत्री हैं. इस नाते यह स्थल वीर हनुमान का ननिहाल भी कहा जाता है.
चुंगी कलेक्टर रेवेल हेनरी के नाम से प्रचलित हुआ रिविलगंज : जब अंग्रेजी सरकार भारत में आयी, तो इस क्षेत्र का विस्तार व्यापारिक केंद्र के रूप में किया गया. ब्रिटिश सरकार के मालवाहक जलपोतों के आवागमन के लिए यहां जहाज घाट बनाया गया. तभी इस क्षेत्र को नगरपालिका के रूप में चिह्नित किया गया. तब के कलेक्टर रेवेल के नाम से 1876 में रिविलगंज नगरपालिका अस्तित्व में आयी.
आज भी प्रचलित है अहल्या उद्धार की कथा : महर्षि गौतम ऋषि मिथला के निवासी थे. उन्हें एक पुत्र सदानंद और एक पुत्री अंजनी थी. महर्षि गौतम सदानंद को जनक के दरबार में पुरोहित का कार्य सौंप कर अपनी पत्नी अहिल्या और पुत्री अंजनी के साथ यही गोदना में तपस्या में लीन हो गये. इसी बीच भगवान इंद्र की नजर अहिल्या पर पड़ी और वे उन्हें पाने के लिए षड़यंत्र में रचने में लग गये.
एक दिन इंद्र के इशारे पर चंद्रमा मुकरेड़ा में मुर्गा बनकर आधी रात को ही बांग देने लगे. महर्षि गौतम ऋषि मुर्गा की बांग (बोली) सुनकर समझे की सुबह हो गयी है और नदी घाट पर स्नान के लिए निकल पड़े. तभी भविष्यवाणी हुई कि ऋषि तुम अपनी कुटी लौट जाओ, तुम्हारे साथ छल हुआ है.
महर्षि गौतम जब अपनी कुटी पर आए, तो देखा कि इंद्र उन्हीं के वेश में उनकी कुटी से बाहर निकल रहे हैं. यह देखते अहिल्या भी समझ गयीं कि उनके साथ छल हुआ है. वह कुछ कह पाती इससे पूर्व ही महर्षि गौतम क्रोध में तिलमिला उठे और उसी वक्त अहिल्या को पत्थर बन जाने का शाप दे दिया. अहिल्या का उद्धार तब हुआ, जब भगवान राम जनकपुर जाने के क्रम में महर्षि गौतम के आश्रम में पहुंचे. यहां उन्होंने अपने स्पर्श से अहिल्या का उद्धार किया.
अभी भी स्थापित हैं भगवान का पदचिह्न : महर्षि गौतम के आश्रम में भगवान राम के पदचिह्न अभी भी स्थापित हैं. इस आश्रम के मठाधीश्वर रामदयालु दास ने बताया कि अब उस पदचिह्न के ऊपर एक मंदिर बना दिया गया है, जहां लोग बाहर से ही दर्शन करते हैं.
आश्रम तक जाने वाला मार्ग भी है जर्जर : छपरा-रिविलगंज मार्ग पर एनएच से महज दो सौ मीटर की दूरी पर महर्षि गौतम का आश्रम स्थित है. इसके बावजूद यहां तक जाने वाले मार्ग की हालत जर्जर हाल में है.
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