Rajendra Prasad Central Agricultural University, Pusaकेले को किसान सिगाटोका रोग से बचायें : वैज्ञानिक
Updated at : 28 Aug 2024 11:32 PM (IST)
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केले की पत्तियों पर लगने वाला ब्लैक सिगाटोका रोग राष्ट्रीय स्तर पर केले की फसल के लिए सबसे घातक रोग माना जाता है.
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Rajendra Prasad Central Agricultural University, Pusa, Main symptoms of Black Sigatoka disease in banana
Samastipur News: पूसा : केले की पत्तियों पर लगने वाला ब्लैक सिगाटोका रोग राष्ट्रीय स्तर पर केले की फसल के लिए सबसे घातक रोग माना जाता है. यह रोग केले की पत्तियों पर लगने वाला (लीफ स्पॉट) एक धब्बानुमा रोग है. इस रोग ने दुनिया भर के कई देशों में केले की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है. भारत की बात करें तो यहां के भी लगभग सभी केला उत्पादक क्षेत्रों से जुड़े केले के बागों में यह रोग प्रमुखता से लगता है. इस रोग के लगने के बाद केले की पत्तियां मर जाती है. जिससे फलों की उपज में भारी कमी आती है. फलों के गुच्छे मिश्रित हो जाते हैं तथा फल समय से पहले ही पक जाते हैं. केला उत्पादक किसान वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर इस रोग से अपने केले के बागों को बचा सकते हैं. ये बातें डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विवि पूसा के पादप रोग विभाग के हेड डॉ. संजय कुमार सिंह ने कही. उन्होंने कहा कि यह रोग दो तरह का होता है काला (ब्लैक) सिगाटोका एवं पीला (येलो) सिगाटोका. ब्लैक सिगाटोका दुनिया भर के कई देशों से जुड़े केले के बागों के लिए एक महत्वपूर्ण रोग है. यह रोग केले का एक पर्ण रोग है, जो फंगस स्यूडोसेर्कोस्पोरा फिजिएंसिस के कारण होता है. इसे ब्लैक लीफ स्ट्रीक (बीएलएस) रोग नाम से भी जानते हैं. ब्लैक सिगाटोका रोग सभी प्रमुख केला उत्पादक देशों में मौजूद है.Samastipur News: Main symptoms of Black Sigatoka disease in banana ब्लैक सिगाटोका रोग के प्रमुख लक्षण
कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि ब्लैक सिगाटोका रोग लगने के बाद केले के पत्तों पर छोटे लाल-जंग खाए भूरे रंग का धब्बा बन जाता है. यह धब्बा पत्तियों के नीचे की तरफ से सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं. ये धब्बे केले के पत्तो पर धीरे-धीरे लंबे, चौड़े और काले होकर लाल-भूरे रंग के पत्ती की धारियां बनाने लगती है. प्रारंभिक धारियां पत्ती शिराओं के समानांतर चलती है और पत्ती के नीचे की ओर अधिक स्पष्ट दिखती है. बाद में यह धारियां चौड़ी हो जाती हैं और पत्ती की दोनों सतहों पर दिखाई देने लगती है. धारियां फैलती हैं और अधिक अंडाकार हो जाती है. बाद में घाव का केंद्र धंसा हुआ दिखाई देने लगता है और समय के साथ उक्त जगह धूसर हो जाता है. उन्होंने बताया कि संक्रमण के इस स्तर पर घाव के किनारे व आसपास एक पीला प्रभामंडल विकसित हो जाता है. उन्होंने बताया कि अतिसंवेदनशील केले की किस्मों में इस रोग के उच्च स्तर के कारण केले की पत्तियां मर जाती हैं जिससे पूरी पत्ती मरकर गिर जाती है. जैसे-जैसे केले की पत्तियां मरने लगती हैं ठीक वैसे वैसे फलों की उपज कम होने लगती है तथा गुच्छों का पकना असमान होने लगता है. ब्लैक सिगाटोका रोग केले के पत्तों को ही खासकर प्रभावित करता है. इस रोग से सबसे कम उम्र की पत्तियां संक्रमण के लिए ज्यादा अतिसंवेदनशील होती हैं. हालांकि बाद में परिपक्व होने पर केले की सभी पत्तियां अधिक प्रतिरोधी भी हो जाती है.Samastipur News: Main symptoms of Black Sigatoka disease in banana केले के प्रभावित पत्तियों को किसान काटकर हटा दें
कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि इस रोग से गंभीर रूप से प्रभावित केले की पत्तियों को किसान काटकर हटा दें. बाद में इन पत्तियों को बाग से बाहर निकालकर किसान जलाकर पूर्णतः नष्ट कर दें या मिट्टी में अधिक गहराई पर लगा दें. किसान इस रोग से बचाव के लिए केले के पौधों पर पेट्रोलियम आधारित खनिज तेल का छिड़काव 01 प्रतिशत एवं किसी एक कवकनाशी जैसे प्रोपिकोनाजोल (0.1 प्रतिशत) या कार्बेन्डाजिम व मैनकोजेब संयोजन (0.1 प्रतिशत) या ट्राइफ्लॉक्सीस्ट्रोबिन एवं टेबुकोनाजोल (1.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ मिलाकर 25 से 30 दिनों के अंतराल पर 5 से 7 बार छिड़काव करें. किसान इस तकनीक से इस रोग को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं. इस रोग को नियंत्रित कर किसान केले की उपज में 20 से 25 प्रतिशत तक की वृद्धि कर सकते हैं.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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By Prabhat Khabar News Desk
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