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शायद ईश्वर को भी आपसे ही गीत सुननी की जिद्द रही होगी

Updated at : 06 Nov 2024 11:01 PM (IST)
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शायद ईश्वर को भी आपसे ही गीत सुननी की जिद्द रही होगी

इसे संयोग कहिए कि जिनके गाने सुन सुनकर हम छठ मनाते रहे हैं उसी छठ के “नहाय खाय” के दिन उनका देहांत हुआ.

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“लोक परंपरा को लोक धुनों में गा गा कर सुनाती हूं,मन के भावोच्छवास को गीतों में गुनगुनाती हूं,लोक स्वरों को सम्पूर्ण समर्पित,मैं शारदा कहलाती हूं.” – शारदा सिन्हा

प्रकाश कुमार, समस्तीपुर : इसे संयोग कहिए कि जिनके गाने सुन सुनकर हम छठ मनाते रहे हैं उसी छठ के “नहाय खाय” के दिन उनका देहांत हुआ. अभी हाल में ही बेटे अंशुमान ने ””””दुखवा मिटाईं छठी मईया”””” का ऑडियो रिलीज किया था. इस बार वीडियो की जगह ऑडियो आने की वजह भी शारदा जी की बीमारी थी. शायद वह जिस दुख को मिटाने की आस लगाए बैठी थीं, वह दुख पति से बिछोह ही था. ” शारदा जी का परिचय चंद शब्दों में लिखना बेमानी होगी. दो महीने पहले ही शारदा जी के पति ब्रज किशोर सिन्हा का देहांत हुआ था. उनका जाना शारदा जी के लिए वज्रपात जैसा था. आप शारीरिक रूप से भले ही अब हमारे बीच नहीं रहेंगे, लेकिन आपका अमर छठ गीत और लोकगीत सदा सदा के लिए रहेगा और हमलोगों के बीच सदा अमर रहेंगी. छठ के पावन पर्व में शायद ईश्वर को भी आपसे ही गीत सुननी की जिद्द थी. समस्तीपुर के कलाकारों का कहना है कि शारदा सिन्हा का हमारे बीच नहीं होना अविश्वसनीय लग रहा है. बिहार की स्वर कोकिला शारदा सिन्हा का निधन एक असाधारण दैवीय संयोग है. उन्होंने छठ गीतों को घर घर और विश्व में लोकप्रिय बनाया और आज इसी महापर्व की पूर्व संध्या पर ब्रह्म में लीन हों गयीं. उनके गाये छठ गीतों से महापर्व की शोभा थी और अनवरत बनी रहेगी. छठ पर्व और शारदा जी तो जैसे एक दूसरे के पर्याय थे. केले के घार, डाभ नींबू, गन्ना जैसी सामग्री के साथ-साथ शारदा जी के गीत के बिना तो छठ पूरा ही नहीं माना जाता. इस बार छठ माई ने उन्हें अपने पास बुला लिया. जैसे खुद उनकी मिसरी जैसी आवाज़ में ””””पहिले पहिल हम कइलीं…”””” सुनना चाहती हों. मंगलवार की सुबह जब उनकी मौत की अफवाह उड़ रही थी तब, एक बड़ा वर्ग छठी मईया और सूरज देव से शारदा सिन्हा के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहा था- हे सुरुज देव, हे आदित नाथ सुन लीं अरजिया हमार…उन्हें छठी मईया पर पूरा विश्वास था कि उनकी प्रार्थना का असर होगा और शारदा सिन्हा उनके बीच स्वस्थ होकर आएंगी, लेकिन शारदा सिन्हा को जीवनसंगी के पास पहुंचना था. सो, चली गईं.

शारदा जी का स्थान कोई नहीं ले सकता

समस्तीपुर की सिंगर स्नेह उपाध्याय का कहना है कि एक ऐसी आवाज को, जिसने छठ जैसे महापर्व से प्रेम करना सिखाया, बिहार की माटी की सौंधी महक गीतों के जरिए कानों से दिल में उतरवाया, दूर प्रदेश में रहने वालों को भी अपने घर के कोने में रहने का एहसास कराया. शारदा जी का स्थान कोई नहीं ले सकता. सदियों – सदियों तक याद की जाएंगी. जब तक सूरज देव में आभा रहेगी तब तक, जब तक छठी मैया पूजी जाती रहेंगी, तब तक आप जीवित रहेंगी अपने श्रोताओं के हृदय में. कलाकार लक्ष्मण गुप्ता ने कहा कि मृत्यु अकाट्य सत्य है इसका आना निश्चित है परन्तु इतनी जल्दी. खैर, कलाकार कभी मरता नहीं सदैव अपनी कलाओं में जीवित रहता है. बिहार का एक और सूरज अस्त हुआ. छठ के गीतों को सुनते हुए जब बड़ा हो रहा था तो बस एक ही नाम बताया जाता, शारदा सिन्हा. भोजपुरी के लिए वे गुड़हल की फूल की तरह थीं जिसे बड़ी श्रद्धा से देवी पर चढ़ाया जाता है. उनकी गायकी गमकते फूलों से कम न थी. सच कहूं तो उन्हें मैंने छठ के गीतों के जरिए ही जाना है. उनकी आवाज ही उनकी पहचान थी. तन मिट्टी का है इसे तो मिट्टी होना ही है पर शब्द मिट्टी नहीं होते. शारदा जी कण कण में रहेंगी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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