फर्श पर मरीजों का इलाज
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :10 Jul 2016 5:09 AM (IST)
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कुव्यवस्था. सदर अस्पताल में बेड व दवाओं की कमी समस्तीपुर : अच्छी चिकित्सा के लिए सदूर देहातों से लोग जिला अस्पताल पहुंचे हैं, लेकिन लोगों को यहां आकर निराशा हाथ लगती है. मरीजों को बेड के अभाव में फर्श पर सोना पड़ता है. सबसे बुरी स्थिति में पुरुष वार्ड की है. नशामुक्ति केंद्र खोले जाने […]
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कुव्यवस्था. सदर अस्पताल में बेड व दवाओं की कमी
समस्तीपुर : अच्छी चिकित्सा के लिए सदूर देहातों से लोग जिला अस्पताल पहुंचे हैं, लेकिन लोगों को यहां आकर निराशा हाथ लगती है. मरीजों को बेड के अभाव में फर्श पर सोना पड़ता है. सबसे बुरी स्थिति में पुरुष वार्ड की है. नशामुक्ति केंद्र खोले जाने के कारण अस्पताल के पुरुष वार्ड को बंद कर दिया गया, जिससे पुरुष मरीजों का ऑपरेशन बंद है. लोगों को निजी क्लिनिक में जाना पड़ रहा है. ऐसी स्थिति में गरीब मरीजों का हाल बेहाल है.
उधर, महिला वार्ड में कम बेड रहने के कारण महिलाओं को भी फर्श पर सोना पड़ता है. इससे वह अपने आप को असुरक्षित महसूस करती हैं. दूसरी ओर दवा के अभाव में भी मरीजों को परेशानी हो रही है. मरीजों को दर्द की दवा भी हॉस्पिटल से नहीं मिल रही है. दवा दुकान से दवा खरीद कर लाना पड़ता है.
पुरुष मरीजों का सदर अस्पताल में नहीं हो रहा ऑपरेशन
नशा मुक्ति केंद्र खोले जाने के कारण सदर अस्पताल के पुरुष वार्ड को बंद कर दिया गया है. अस्पताल पहुंचने वाले पुरुष मरीजों को इमरजेंसी वार्ड में रखा जाता है. जहां सिर्फ छह बेड हैं. इस दौरान अगर सड़क दुर्घटना आदि में घायल कई मरीज पहुंच गये तो पूर्व से भरती मरीजों को जाने को कहा जाता है अथवा उन्हें बेड से हटा दिया जाता है. ऐसी स्थिति में मरीज फर्श पर सोने को मजबूर हो जाते हैं. अस्पताल के सर्जन डॉक्टरों का कहना है कि पुरुष वार्ड नहीं रहने के कारण अस्पताल में पुरुष मरीजों का ऑपरेशन नहीं किया जा रहा है. चुकी ऑपरेशन के बाद मरीजों को आठ दिनों तक देखरेख की जरूरत होती है. मरीजों को ऑपरेशन के बाद घर भेजने पर कुछ भी संभव है.
इमरजेंसी में ही रहते हैं पुरुष मरीज
महिला वार्ड में केवल 30 बेड
सदर अस्पताल के महिला वार्ड में मात्र दस बेड हैं. वैसे वार्ड में दस और बेड लगाया गया है. प्रसूता वार्ड में 30 बेड की व्यवस्था है. लेकिन सदर अस्पताल में रोजना 40-50 प्रसव होने के कारण बेड की कमी हो जाती है. इसे महिला मरीजों को जमीन पर सोना पड़ता है. हालांकि, बेड की कमी के बारे में कई बार अस्पताल प्रशासन की ओर से विभाग को लिखा गया है, लेकिन अबतक बेड की व्यवस्था नहीं की गयी है.
दर्द की भी दवा नहीं
सदर अस्पताल में दर्द की भी दवा नहीं मिल रही है. मरीजों को बाजार से दवा खरीदकर लाना पड़ता है. सूत्रों ने बताया कि जिला को दवा खरीदने के लिए तीन करोड़ रुपये मिले थे. दवा की खरीदारी नहीं होने के कारण राशि लौट गयी. इस कारण जिले भर के अस्पतालों में दवा का अभाव है.
निविदा की प्रकिया जारी
अस्पतालों में बेड की कमी दूर करने के लिए विभाग को लिखा गया है. सरकार के निर्देश पर पुरुष वार्ड को बंद कर नशा मुक्ति केंद्र खोला गया था. पुरुष मरीजों को परिवार नियोजन वार्ड में रखा जाता है. दवा खरीदारी के लिए जिला स्तर पर निविदा निकालने की प्रक्रिया चल रही है.
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