विडंबना: विदेशी आते नहीं, देसी पक्षी की हो रही अनदेखी

सहरसा : नगरचिडि़या की चूं-चूं व कलरव ध्वनि को सुनकर मौसम के खुशनुमा पल व दूसरे प्रदेशों से आने वाले प्रवासी मेहमानों की उड़ान कभी मत्स्यगंधा की रौनक हुआ करती थी. जिले के दूर-दराज में रहने वाले लोग भी मत्स्यगंधा झील पहुंच मेहमान पक्षियों की चहचहाहट को सुनने के लिए बेकरार दिखते थे, लेकिन बीते […]
सहरसा : नगरचिडि़या की चूं-चूं व कलरव ध्वनि को सुनकर मौसम के खुशनुमा पल व दूसरे प्रदेशों से आने वाले प्रवासी मेहमानों की उड़ान कभी मत्स्यगंधा की रौनक हुआ करती थी. जिले के दूर-दराज में रहने वाले लोग भी मत्स्यगंधा झील पहुंच मेहमान पक्षियों की चहचहाहट को सुनने के लिए बेकरार दिखते थे, लेकिन बीते आठ वर्षों में प्रवासी पक्षियों की टोली नहीं दिख रही है.
दूसरी तरफ कोसी क्षेत्र में पाये जाने वाली पक्षी भी अब कम नजर आती है, जो निश्चित रूप से पर्यावरण के अनुकूल नहीं है. —साइबेरियन का बनता था ठिकानाशहर के उत्तरी क्षेत्र मत्स्यगंधा में उस समय दिसबंर के शुरू होते ही साइबेरियन पक्षी का आगमन शुरू हो जाता था. उनके यहां आने का सिलसिला जनवरी महीने तक चलता रहता था.
विशेषज्ञ बताते हैं कि शीत प्रदेश में मौसम गरम होने व बर्फ के पिघलने पर पक्षी किसी अन्य ठंडे प्रदेश की ओर रूख करते हैं. भारत उनका पसंदीदा प्रदेश है. कोसी इलाका होने के कारण किंगफिशर, लालशर, क्रौंच व कीवी भी सहरसा पहुंचते थे. मत्स्यगंधा जलाशय जब तक अस्तित्व में रहा. यहां भी विदेशी पछी का आना लग रहा.
सुबह से लेकर शाम तक लोग झील के किनारे खड़े होकर मेहमान पक्षी को उड़ान भरते देखा करते थे. –घनी आबादी ने तोड़ दी दोस्तीविदेशी व प्रवासी पक्षियों से स्वदेशी पक्षियों के घुलने मिलने का यह सिलसिला धीरे-धीरे ही सही लेकिन थम चुका है. विशेषज्ञ बताते हैं कि पूर्व के समय में मत्स्यगंधा का इलाका आबादी विहीन था, लेकिन अभी के समय में झील के चारों तरफ घनी बस्ती बस चुकी है. इसके अलावा बिजली के हाइ वोल्टेज प्रवाहित तारों को गुजारा गया है.
इस वजह से पक्षियों ने अपना रास्ता बदल लिया है. –प्रदूषण भी है वजह देसी व विदेशी पक्षी की संख्या कम होने की वजह के रूप में बढ़ रहे प्रदूषण को देखा जा रहा है. जानकार बताते हैं कि वातावरण में दूषित हवा पक्षियों को मिलने वाली स्वच्छ हवा में कटौती करती है, जिसका खामियाजा है कि साल में महीने भर के लिए प्रवास करने वाले पक्षी नहीं आ रहे हैं.
बताते हैं कि वाहन व हवाई जहाज की बढ़ती संख्या व मोबाइल टावर वातावरण को ज्यादा दूषित कर रही है. कोसी के इलाके से विदेशी पछियों को भगाने में यहां के बहेलियों की भी बड़ी भूमिका है. यहां वैसे दुर्लभ पछियों को खाने की परंपरा बनी हुई है. –पिंजड़े में मर जाता है तोतापक्षी संरक्षण एक्ट 1954 के अनुसार भारत में पक्षियों को पिंजरे में कैद करना व उनकी बिक्री अपराध है.
इसके बावजूद बाजार से लेकर घरों तक तोता व मैना को कैद कर मन बहलाने के लिए रखा जाता है. पिंजरे में कैद तोता कभी आजाद नहीं हो पाती है. पिंजरे में रहने के कारण उनकी संख्या बढ़ नहीं पाती है. स्वदेशी पंछी की श्रेणी में आने वाले चील, गिद्ध, कौआ की संख्या अब काफी कम हो गयी है. पछियों का कलरव फिर से सुनने के लिए भी हमें फिर से पुराना वातावरण लौटाना होगा. इसमें जितनी भूमिका सरकार व प्रशासन की होगी, उतनी ही आम जनता की भी.
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