छोटे शहरों में शास्त्रीय संगीत की बातें

Published at :28 Nov 2015 6:51 PM (IST)
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छोटे शहरों में शास्त्रीय संगीत की बातें

छोटे शहरों में शास्त्रीय संगीत की बातेंबातों ही बातों मेंगिरीन्द्र नाथ झा संगीत की तरफ रुझान हमेशा रहा लेकिन इस बात का दुख हमेशा रहेगा कि शास्त्रीय संगीत के व्याकरण को कभी समझ नहीं सका, लेकिन जब कभी भी मौका मिलता है तो शास्त्रीय संगीत कार्यक्रमों में जरूर पहुंचता हूं. पंडित जसराज को सुनकर एक […]

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छोटे शहरों में शास्त्रीय संगीत की बातेंबातों ही बातों मेंगिरीन्द्र नाथ झा संगीत की तरफ रुझान हमेशा रहा लेकिन इस बात का दुख हमेशा रहेगा कि शास्त्रीय संगीत के व्याकरण को कभी समझ नहीं सका, लेकिन जब कभी भी मौका मिलता है तो शास्त्रीय संगीत कार्यक्रमों में जरूर पहुंचता हूं. पंडित जसराज को सुनकर एक अजीब ही सुख मिलता है़ फणीश्वर नाथ रेणु के शब्दों में कहूं तो देहातीत सुख का अनुभव करता हूं और मन सा-रे-गा-मा के धुनों और न जाने कितने रागों में खो जाता है़ वही अनुभव इन दिनों आगरा घराना के वसीम अहमद खान को सुन कर मिलता है़ सबसे खुशी इस बात की हो रही है कि बिहार के अलग-अलग हिस्सों में शास्त्रीय संगीत के प्रति बच्चों का लगाव बढ़ा है़ सीमांचल और आसपास के इलाकों में तो बच्चों में शास्त्रीय संगीत के प्रति में गजब का लगाव दिखता है़ आप कहेंगे कि वेस्टर्न म्यूजिक या फिर बॉलीवुड के दौर में यह कैसी बात कर रहा हूं लेकिन यकीन मानिए ऐसा हो रहा है़ मैं बार-बार आगरा घराना के वसीम अहमद खान की बात करना चाहूंगा़ हाल ही में खान साहेब से पूर्णिया में मुलाकात हुई थी़ वह कोलकाता में रहते हैं. आइटीसी एसआरए से जुड़े खान साहेब बड़ी लगन से अपने शिष्यों को शास्त्रीय संगीत के रागों से परिचित करा रहे हैं. देश-विदेश में अपनी मधुर आवाज से लोगों का मन मोहने वाले वसीम अहमद खान साहेब से जब मुलाकात हुई तो मुझे कई नयी जानाकरियां मिली़ मसलन संगीत में घराना को लेकर अब तक जो मेरी धारणा परिवारवाद को लेकर थी, वह गलत साबित हुई़ उन्होंने बताया कि जो शिष्य काबिल होगा उसी को आगे बढ़ाया जाता है न कि उससे कमजोर अपने परिवार के सदस्य को़ मुझे यह जानकर खुशी हुई़ पूर्णिया, किशनगंज, भागलपुर और अन्य इलाकों की बात करूं तो इन शहरों में संगीत के शिक्षक आपको मिल जायेंगे, जो पेशेवर तरीके से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दे रहे हैं और यहां पढ़ने वाले छोटे उम्र के बच्चे होते हैं. यह सब देख कर अच्छा लगता है़ वसीम अहमद खान साहेब का एक शिष्य अंकुर है़ अंकुर 11 वीं में पढ़ाई करता है और साथ में उसी मनोयोग से शास्त्रीय संगीत की भी शिक्षा ले रहा है़ वह छोटी उम्र से ही संगीत से जुड़ा है़ वह शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों के अभ्यास के लिए पूर्णिया से कोलकाता भी जाता है़ पढ़ाई के साथ यह सब करना एक बड़ी चुनौती है लेकिन युवा वर्ग को ऐसी कहानी सुनाने की भी जरूरत है़ दरअसल हम सब मॉल, मल्टीप्लेक्स, महंगी गाड़ी, स्मार्टफोन आदि सुविधाओं से लैस वक्त में अंधे होकर भाग रहे हैं, ऐसे में पुरानी चीजों को जो संभाल रहा है, उससे सीख लेनी चाहिए़ शास्त्रीय संगीत के फायदे को समझना होगा और जो समझ चुके हैं उन्हें नयी पीढ़ी को समझाना होगा़ ठीक वैसे ही जैसे वसीम अहमद खान कर रहे हैं. उन जैसे देश में कई लोग होंगे, हमलोगों को ऐसे लोगों के करीब से जानना होगा़ डिजिटल दिखावे की दुनिया में दौड़ लगाती युवा पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत या फिर अन्य माध्यमों की तरफ लौटाने के लिए हम सभी को मेहनत करना होगा. ठीक वैसे ही जैसे कोलकाता के वसीम अहमद खान कर रहे हैं. इससे तसवीर जरूर बदलेगी और शास्त्रीय संगीत को छोटे शहरों में भी लोकप्रियता मिलेगी़

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