दर्द को लकीर व सोच को रंगों में ढाल देता है नन्हा चित्रकार
Updated at : 19 Apr 2019 6:14 AM (IST)
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विष्णु स्वरूप, सहरसा : कहते हैं दर्द आने की कोई दस्तक नहीं होती और जब टूटता है दर्द का पहाड़ तो कोई एक गमजदा नहीं होता. बल्कि कई इसमें शरीक हो जाते हैं. दस वर्ष का प्रशांत भी इसका हिस्सा बना. उसकी सुनने की और बोलने की क्षमता जन्म के छह महीने बाद ही समाप्त […]
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विष्णु स्वरूप, सहरसा : कहते हैं दर्द आने की कोई दस्तक नहीं होती और जब टूटता है दर्द का पहाड़ तो कोई एक गमजदा नहीं होता. बल्कि कई इसमें शरीक हो जाते हैं. दस वर्ष का प्रशांत भी इसका हिस्सा बना. उसकी सुनने की और बोलने की क्षमता जन्म के छह महीने बाद ही समाप्त हो गयी.
शिक्षक पिता विनय कुमार पोद्दार व पूनम देवी की इकलौता संतान होने के कारण माता पिता अक्सर प्रशांत के भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे. लेकिन कैनवास थामते ही माता-पिता की चिंता धीरे-धीरे दूर होने लगी है. अब प्रशांत की पेंटिंग लोगों की प्रशंसा बटोरती ही जा रही है.
बेहतरीन चित्रकार है प्रशांत, चाहता है और ज्यादा सीखना
प्रशांत के पिता तब निराशा के दौर से गुजर रहे थे. विद्यालय जाना भी प्रशांत के लिए बेकार साबित हो गया तो उन्होंने यह महसूस किया कि वह कई बातें इशारों में या कागज पर चित्रों के माध्यम से व्यक्त करता है. फिर पूरे परिवार का ध्यान इस ओर गया और इसके लिए एक ट्यूटर की व्यवस्था की गयी. बी विद्या विहार से इसे चित्रकारी का प्रारंभिक ज्ञान हासिल हुआ.
अध्ययन करता छात्र, पीएम नरेंद्र मोदी, वोटिंग करते बच्चे, बूढ़ी मां, अपनी मां से जिद करता हुआ बच्चा, काफी खूबसूरत चित्र प्रशांत ने इतनी कम उम्र में बनाये हैं. लोगों ने इसे काफी पसंद किया. स्क्रैच से चित्र बनाने की कला पोट्रेट आर्ट और वाटर कलर पेंटिंग में प्रशांत को महारत हासिल है. प्रशांत बोल और सुन नहीं पाता.
इसलिए भावनाओं को समझने की कोशिश करता है फिर उसे लकीरों के शक्ल में रंगों से सजा जीवन के यथार्थ को सामने ला खड़ा करता है. सीमित संसाधनों में प्रतिभा उभरती तो है पर विस्तृत आकाश की तरह नहीं फैल पाती है. दस साल का नन्हा प्रशांत और ज्यादा सीखना चाहता है. लेकिन सीमित आय और शहर की चारदीवारी में एक उभरता हुआ चित्रकार संभावनाओं की बाट जोह रहा है.
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