ट्रेन हादसा : 37 साल पहले बागमती में समा गये थे सैकड़ों लोग

Updated at : 06 Jun 2018 3:59 AM (IST)
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ट्रेन हादसा : 37 साल पहले बागमती में समा गये थे सैकड़ों लोग

6 जून 1981 को भारतीय रेल के इतिहास का वह काला जिस दिन देश की सबसे बड़ी रेल दुर्घटना हुई पूर्व मध्य रेलवे अंतर्गत सहरसा-मानसी रेलखंड के धमारा घाट और बदला घाट स्टेशन के बीच पुल संख्या 51 पर हुआ था हादसा सिमरी : 6 जून 1981 यानी आज से ठीक 37 साल पहले का […]

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6 जून 1981 को भारतीय रेल के इतिहास का वह काला जिस दिन देश की सबसे बड़ी रेल दुर्घटना हुई

पूर्व मध्य रेलवे अंतर्गत सहरसा-मानसी रेलखंड के धमारा घाट और बदला घाट स्टेशन के बीच पुल संख्या 51 पर हुआ था हादसा
सिमरी : 6 जून 1981 यानी आज से ठीक 37 साल पहले का वक्त, जिसे याद करने के बाद आज भी रूह कांप जाती है, जी हां यह देश का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेल हादसा है. जिसमें सैकड़ों लोग काल के गाल में समा गये. यात्रियों से भरी ट्रेन बागमती में समा गयी.
कैसे हुआ था हादसा: कहा जाता है कि छह जून 1981 दिन शनिवार की देर शाम जब मानसी से सहरसा ट्रेन जा रही थी. इसी दौरान पुल पर एक भैंस आ गयी, जिसे बचाने के लिए ड्राइवर ने ब्रेक मारी पर बारिश होने की वजह से पटरियों पर फिसलन की वजह से गाड़ी पटरी से उतरी और रेलवे लाइन का साथ छोड़ते हुए सात डिब्बे बागमती नदी में डूब गये. वहीं यह भी माना जाता है कि पुल नंबर 51 पर पहुंचने से पहले जोरदार आंधी और बारिश शुरू हो गयी थी. बारिश की बूंदें खिड़की के अंदर आने लगी तो अंदर बैठे यात्रियों ने ट्रेन की खिड़की को बंद कर दिया. जिसके बाद हवा के एक ओर से दूसरी ओर जाने के सारे रास्ते बंद हो गये और तूफान के भारी दबाव के कारण ट्रेन की बोगी पलट कर नदी में जा गिरी. हालांकि दूसरी बात अधिक प्रमाणिक थी कि तेज आंधी में यात्रियों द्वारा खिड़की बंद करना घातक साबित हुआ.
मानवता हुई थी कलंकित: जो उस दुर्घटना में बच गये, वे आज भी उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं. बताया जाता है कुछ यात्री चोट लगने या तैरना नहीं जानने की वजह से डूब गये. जो तैरना जानते थे, खुद निकले व परिजनों को भी निकला. लेकिन शर्मनाक यह कि तैर कर बाहर आने वालों से कुछ स्थानीय लोगों ने लूटपाट शुरू कर दी. यहां तक कि प्रतिरोध करने वालों को कुछ लोगों ने फिर से डुबोना शुरू कर दिया. महिलाओं की आबरू तक पर हाथ डालने का प्रयास किया गया.
मृतकों की संख्या पर कंफ्यूजन: वर्ष 1981 के सातवें महीने का छठा दिन 416 डाउन पैसेंजर ट्रेन की दुर्घटना के बाद तत्कालीन रेलमंत्री केदारनाथ पांडे ने घटनास्थल का दौरा किया. रेलवे द्वारा बड़े पैमाने पर राहत व बचाव कार्य चलाया गया. लेकिन रेलवे द्वारा घटना में दर्शायी गयी मृतकों की संख्या आज भी कन्फ्यूज करती है. क्योंकि सरकारी आंकड़े जहां मौत की संख्या सैकड़ों में बताते रहे तो वहीं अनधिकृत आंकड़ा हजारों का था.
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