किताब, कॉपी, ड्रेस मटेरियल का अभिभावकों के ऊपर बढ़ता बोझ

किताब, कॉपी, ड्रेस मटेरियल का अभिभावकों के ऊपर बढ़ता बोझ
प्रशासनिक समाधान कितना होगा कारगर पढ़ाई का स्तर और बजट में कैसे बैठेगा सामंजस्य कोचिंग पर गाज कोई नई बात नहीं सहरसा . हर साल एक महीने का यह शोर महज चुनावी प्रतीत होता है, जब विभिन्न सोशल मीडिया पर किताब विक्रेताओं को जली कटी सुनाई जाती है. विक्रेता विद्यालय प्रबंधन पर अधिक मूल्य और कमीशन खोरी का आरोप लगाते हैं तो प्रबंधन पब्लिशर्स द्वारा मूल्य वृद्धि का बहाना बनाते हैं. बहरहाल बहानेबाजी के पीछे यह बात दीगर है कि पुस्तक विक्रेताओं और विद्यालय पर मालिकाना हक रखने वाले प्रबंधन दोनों की गहरी सांठ गांठ है. ताज्जुब कि बात यह है कि व्यापारिक प्रतियोगिताओं में पुस्तक विक्रेता अब पब्लिशर से उन पुस्तकों की मांग करते हैं, जिसमें मार्जिन ज्यादा है. जबकि पुस्तक सामग्री उन्नत किस्म की नहीं होती है. लेखन में अशुद्धियां रहती है लेकिन डिस्काउंट सत्तर प्रतिशत तक रहता है और यही से भ्रष्टाचार का खेल शुरू होता है. जिसमें लाभ विद्यालय प्रबंधन को ज्यादा मिलता है और अभिभावक स्तरहीन पठन-पाठन के लिए ज्यादा मूल्य चुका रहे हैं और अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते हैं. प्रशासन ने कितना किया समाधान अभिभावकों के बढ़ते दबाव और लगातार स्कूल प्रबंधन के खिलाफ उसकी आवाज के मद्देनजर प्रशासन ने एक बैठक शिक्षक और चुनिंदा प्रतिनिधि के साथ की. जहां एनसीईआरटी की अनिवार्यता को बरकरार रखा गया. वहीं हिंदी पठन पाठन पर जोर देने को कहा गया. विद्यालय के समय में कोचिंग सेंटर बंद रहेंगे, यह भी निर्णय में शामिल था. अब सवाल यह उठता है कि पहले भी इस तरह के निर्णय लिए गये हैं. लेकिन नतीजा सिफर रहा. इस बार भी कुछ महत्वपूर्ण बातें होंगी और परिणाम आयेगा, इस पर भी संशय बना हुआ है. स्कूलों में एनसीईआरटी के साइड बुक को तव्वजो दी जाती है. अभिभावकों को यह कहा जाता है कि इसमें कुछ नहीं है, यह एक महीने में पूरी किताब खत्म हो जाती है. दूसरी और किताब दुकानदार इसकी उपलब्धता का रोना भी रोते हैं और कहते हैं कि यह पूरी मात्रा में किताब नहीं मिलती है, ऊपर से डुप्लीकेट किताब अलग समस्या बनी हुई है. सामाजिक अंकेक्षण की है जरूरत प्रशासन की ओर से प्रत्येक विद्यालय में अभिभावकों की एक कमेटी बनाकर सरकारी आदेशों के पालन पर नजर रखने को कहा जाये. पुस्तकों की उपलब्धता प्रत्येक दुकान पर सुनिश्चित होने से भी मूल्य नियंत्रित रहेगा. विद्यालय एमआरपी से नीचे छूट देते हुए मूल्य निर्धारण कर किताबों के लिस्ट पर उसे अंकित कर दें तो तो भी वर्तमान स्थिति नियंत्रित हो जायेगी. कॉपियों के मूल्य पर लगभग तीस प्रतिशत डिस्काउंट अब बाजार में उपलब्ध होने लगे हैं. दुखद बात यह है कि शहर में मध्यम और निम्न वर्ग की आबादी अत्यधिक है जिसका एक महीने का वेतन लगभग अपने बच्चों की किताब, कॉपी और विद्यालय के नामांकन फीस में ही समाप्त हो जाता है. ऐसे में एक बड़ी समस्या परिवार के सामने आ जाती है. सरकारी विद्यालयों का हाल पहले से बेहाल है. उसमें बेहतर प्रबंधन और पढ़ाई पर जहां फोकस की आवश्यकता है. वहीं प्राइवेट स्कूल पर गहन निगरानी की जरूरत आन पड़ी है. किताबों के अनाप-शनाप दाम पर भी सवाल उठाए गये हैं, इस पर अलग से चिपकाये गए स्टीकर एक ओर उपभोक्ता कानून को मुंह चिढ़ा रहे हैं. वहीं दूसरी ओर ग्राहकों के मोल भाव के अधिकार को भी पुस्तक विक्रेता सिरे से खारिज करते हैं. इस पर प्रशासन की नजर भी होनी चाहिए, दुकानों पर खड़ी अभिभावकों की भीड़ कई और गंभीर आरोपों लगती है
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