30 लाख के बदले मिलीं 13 लाख पुस्तकें

Updated at : 06 Apr 2018 5:18 AM (IST)
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30 लाख के बदले मिलीं 13 लाख पुस्तकें

सहरसा : नये सत्र के शुरू होते ही पाठ्यक्रम की किताबों को लेकर अभिभावक विद्यालय प्रबंधन और पुस्तक विक्रेताओं में तनातनी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. कई विद्यालयों ने सरकारी गाइड लाइन के अनुसार एनसीइआरटी की पुस्तकों को अपनी पुस्तक सूची में डाला है. लेकिन पुस्तक विक्रेता उसे उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं. […]

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सहरसा : नये सत्र के शुरू होते ही पाठ्यक्रम की किताबों को लेकर अभिभावक विद्यालय प्रबंधन और पुस्तक विक्रेताओं में तनातनी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. कई विद्यालयों ने सरकारी गाइड लाइन के अनुसार एनसीइआरटी की पुस्तकों को अपनी पुस्तक सूची में डाला है. लेकिन पुस्तक विक्रेता उसे उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं. स्थानीय एनसीइआरटी के थोक विक्रेता और एजेंसी संचालक बमबम सिंह का कहना है कि मार्च में एनसीइआरटी से तकरीबन तीस लाख की पुस्तकें मांगी गयी थी तो मात्र तेरह लाख की पुस्तकें मिली है. अप्रैल में लगभग तीस से पैंतीस लाख की डिमांड फिर खड़ी है. जिसका इंडेंट अब तक नहीं मिला,

न ही कोई मेल आ रहा है. कोलकाता डिपो में माल अनुपलब्ध रहने की बात बतायी जाती है. एनसीइआरटी की एजेंसी कोसी प्रमंडल में अपूर्वा बुक स्टोर सहरसा के पास है. जिसके पास पूर्णिया, खगड़िया दरभंगा, अररिया तक से डिमांड आ रही है और वह देने में अक्षम साबित हो रहा है. केंद्रीय विद्यालय खगड़िया ने भी सहरसा स्थित इस एजेंसी को मेल कर आॅर्डर दिया है. लेकिन पुस्तकों की अनुपलब्धता से प्राइवेट प्रकाशक लाभान्वित हो रहे हैं. विद्यालय प्रबंधन ने भी इस संबंध में अपने हाथ खड़े कर लिए हैं.

उधर विद्यालय प्रबंधन छात्रों को दस प्रतिशत तक छूट प्राप्त करने को कहता है. लेकिन पुस्तक विक्रेता उन्हें कोई छूट नहीं देते हैं. स्थिति में भी अभिभावक और पुस्तक विक्रेताओं के बीच वाद-विवाद की स्थिति बार-बार उत्पन्न हो जाती है. एनसीइआरटी की पुस्तकों में कोई भी छूट उपलब्ध नहीं है. लेकिन प्राइवेट बुक्स पर छूट उपलब्धता होती है. अभिभावक कहते हैं कि नये सत्र के शुरुआती दिनों में उनके घर का बजट बिल्कुल बदल जाता है और किताब, कॉपी, पेंसिल, गारमेंट्स, जूते-चप्पल, स्कूल बैग के कारण उनका मासिक बजट बिल्कुल ही आर्थिक असंतुलन पैदा कर परेशान कर देता है. ऐसे में इन विद्यालय प्रबंधन के प्रबंधकों के खिलाफ रोष व्यक्त करना लाजिमी है. क्योंकि हर साल फीस की बढ़ोतरी, किताबों के मूल्य में बढ़ोतरी से वह हलकान हो रहे हैं.

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