सुबह होती है सॉफ्टवेयर की लॉगिंग, शाम में करते हैं छापेमारी
Updated at : 31 Jan 2018 5:33 AM (IST)
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दस बजे एसी व 11 बजे स्लीपर की होती है बुकिंग सहरसा : तत्काल टिकट के खेल को रोकने में रेलवे के अधिकारी फिलवक्त असफल साबित हुए हैं. फर्जी सॉफ्टवेयर के जरिये आइआरसीटीसी की वेबसाइट में सेंध लगाने की प्रक्रिया रोजाना दस बजे शुरू होती है. जो कि ग्यारह बजे तक टिकट उड़ाने में कामयाब […]
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दस बजे एसी व 11 बजे स्लीपर की होती है बुकिंग
सहरसा : तत्काल टिकट के खेल को रोकने में रेलवे के अधिकारी फिलवक्त असफल साबित हुए हैं. फर्जी सॉफ्टवेयर के जरिये आइआरसीटीसी की वेबसाइट में सेंध लगाने की प्रक्रिया रोजाना दस बजे शुरू होती है. जो कि ग्यारह बजे तक टिकट उड़ाने में कामयाब हो जाती है. ग्यारह बजे के बाद फर्जीवाड़ा करने के सभी साक्ष्य दलालों द्वारा नष्ट कर दिये जाते हैं. दूसरी तरफ इस रैकेट को पकड़ने के लिए रेलवे के अधिकारी शाम में निकलते हैं. शायद यही वजह है कि छापेमारी टीम के हाथ कुछ नहीं लग पाता है. ज्ञात हो कि रेल टिकट बुक करना हमेशा से मुश्किल भरा रहा है. फिर चाहे वह टिकट खिड़की हो या रेलवे की वेबसाइट पर.
आम आदमी की इस समस्या को दूर करने के लिए रेल विभाग लगातार अपने सिस्टम में सुधार करता रहा है लेकिन दलाल किसी न किसी तरीके से सुरक्षा या सिस्टम में सेंध लगा ही लेते हैं. आम आदमी रेलवे की वेबसाइट पर तत्काल टिकट बुक करने के लिए सर्वर का लिंक मिलने का इंतजार ही करता रह जाता है और दलाल अपने कंप्यूटर पर पल भर में ही टिकट बुक कर ले जाते हैं.
यात्रियों को हो रही परेशानी: रेलवे के बुकिंग काउंटर पर तत्काल टिकट नहीं मिलने से निराश लोगों को गिरोह के पकड़े जाने पर आरक्षण में सुविधा मिलेगी. आम लोगों को काउंटर से ही टिकट मिल जायेगी. जबकि अभी तक दलाल व उनके सहयोगियों का ही इस प्रकार के टिकट पर कब्जा बना हुआ है. जिसके एवज में दलाल लोगों से मनमाफिक रुपया वसूलता है. खासकर सहरसा से खुलने वाली गरीब रथ व पुरबिया एक्सप्रेस में सफर करने वाले यात्रियों को इस प्रकार की परेशानी से रोजाना रू-ब-रू होना पड़ता है.
कुछ सेकेंड में बुक हो जाती है टिकट
नेट पर कई ऑनलाइन सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं जिनके जरिये वे तेजी से आइआरसीटीसी की वेबसाइट एक्सेस कर टिकट बुक करते हैं. आम आदमी जहां कंप्यूटर पर सर्वर का लिंक मिलने के बाद ही अपना डिटेल भर पाता है. वहीं दलाल इन सॉफ्टवेयरों के जरिये पहले से सारी डिटेल भर कर तैयार रखते हैं. बुकिंग के समय जैसे ही सर्वर का लिंक खुलता है वे सिर्फ एंटर बटन दबाते हैं और पेमेंट की प्रोसेसिंग शुरू हो जाती है. खास बात यह भी है कि टिकट बुकिंग के समय आने वाला कैप्चा भी दस बजे से तीन मिनट पहले ही दलालों के कंप्यूटर स्क्रीन पर आ जाता है. जबकि आम यात्रियों को कैप्चा भरने में ही टिकट के बजाय नो रूम का डिस्प्ले दिखने लगता है.
5000 से 10000 तक में मिलते हैं सॉफ्टवेयर
सॉफ्टवेयर मामले के जानकार बताते हैं कि टाइप करने वाला कितना भी तेज हो पूरी डिटेल भरने में एक मिनट से ज्यादा का वक्त लग ही जाता है. तब तक ये दलाल सॉफ्टवेयर के जरिये टिकट बुक भी कर चुके होते हैं. दलालों की मानें तो तेज टिकट बुक करने में मदद करने वाले एक नहीं आधा दर्जन से भी ज्यादा सॉफ्टवेयर हैं. जो 5000 से दस हजार रुपये तक में ऑनलाइन मिलते हैं और बेचने वाले दूर दूसरे जिले में या फिर राज्यों में कहीं बैठे होते हैं. इनके एजेंट स्थानीय बाजार में सॉफ्टवेयर बेचने का काम करते हैं.
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