डालमियानगर की राह पर चली बंजारी फैक्टरी

Published at :14 Sep 2017 10:09 AM (IST)
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डालमियानगर की राह पर चली बंजारी फैक्टरी

बिल बकाया होने से 25 अगस्त से ही बंद है बिजली की आपूर्ति कभी हड़ताल, तो कभी प्रबंधन की लापरवाही के कारण फैक्टरी बंद होने से पड़ रहा प्रभाव छह साल से जमा नहीं हुई मजदूरों के पीएफ खातों में कोई राशि प्रबंधन जता रहा फैक्टरी की हालत जल्द सुधरने की उम्मीद मुकेश पांडेय डेहरी […]

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बिल बकाया होने से 25 अगस्त से ही बंद है बिजली की आपूर्ति
कभी हड़ताल, तो कभी प्रबंधन की लापरवाही के कारण फैक्टरी बंद होने से पड़ रहा प्रभाव
छह साल से जमा नहीं हुई मजदूरों के पीएफ खातों में कोई राशि
प्रबंधन जता रहा फैक्टरी की हालत जल्द सुधरने की उम्मीद
मुकेश पांडेय
डेहरी : समापन में चले गये रोहतास उद्योग समूह के नक्शे कदम पर चल रहे कल्याणपुर सीमेंट लिमिटेड (केसीएल) में पिछले 18 दिनों से उत्पादन ठप रहने के कारण हजारों हाथों को कम मिलना बंद हो गया है.
सन, 1932 में स्थापित केसीएल प्रदेश का एकलौता ऐसा सीमेंट का कारखाना है, जो अपने माईंस से खुद पत्थर निकल कर क्लींकर तैयार कर सीमेंट बनाता है. 90 के दशक तक देश के उद्योग जगत में अपनी अच्छी पकड़ बना चुकी उक्त कंपनी का बुरा दिन 2003-04 में उस समय शुरू हो गया जब बिजली के बिल बकाया रहने के कारण 15-15 दिनों तक फैक्टरी में बिजली की आपूर्ति को बंद किया जाने लगा.
गौरतलब है कि मजदूरों के सहयोग व मैनेजमेंट की सूझ-बूझ से फैक्ट्री के हालात कुछ सुधरे तो में वर्ष 2010-11 तक सब कुछ ठीक ठाक चला, लेकिन पुनः प्रबंधन की लापरवाही कहें या कुछ और फैक्ट्री के हालात बिगड़ते चले गये.
वर्ष 1990 में फैक्टरी प्रबंधन ने अपने हालात सुधारने के लिए होल्डर बैंक के साथ पार्टनरशिप कर नयी यूनिट डालने का फल किया. उस समय मजदूर संगठनों द्वारा मजदूरों के हितों को लेकर आंदोलन भी किया गया. नयी यूनिट वर्ष 1994 में चालू हुआ. उस समय मजदूरों द्वारा किया गया हड़ताल संभवत उस फैक्टरी में पहला हड़ताल था. उसके बाद जो हड़ताल का दौर जारी हुआ वह करीब दो दर्जन का आंकड़ा पार कर चुका है.
रामकृष्ण डालमिया द्वारा वर्ष 1911 में शुरू किये गये डेहरी लाइट रेलवे के बाद वर्ष 1921 में स्थापित शूगर प्लांट से बिहार में एक बड़े उद्योग की शुरुआत हुई थी. इसके बाद वर्ष 1933 में पेपर उद्योग व वर्ष 1935-36 में सीमेंट उद्योग की स्थापना हुई. उक्त उद्योग समूह को वर्ष 1982 में ग्रहण लगने की शुरुआत मजदूरों के हड़ताल से ही हुई मान जाता है. 1982 में ही कंपनी प्रबंधन द्वारा लॉकअप घोषित कर दिये जाने के बाद वर्ष 1983 के मई-जून में मजदूरों के हड़ताल के दौरान कंपनी की बिजली काट दी गयी. यही नहीं मजदूरों के उग्र प्रदर्शन के दौरान करीब 17 अधिकारियों की पिटाई भी की गयी थी.
नौ जुलाई, 1984 को रोहतास उद्योग समूह जिसके अंदर 14 से 15 हजार अधिकारी व मजदूर कार्यरत थे. कंपनी ने क्लोजर नोटिस लगा दिया. इतने बड़े उद्योग के बंद होने के बाद जिले में मजदूरों के लिए वरदान साबित हो रहे जिले के इकलौता सीमेंट फैक्टरी केसीएल की हालात भी इन दिनों कुछ ठीक दिखाई नहीं देती. हालांकि, हड़ताल पर रहे मजदूर व प्रबंधन दोनों ही कहते हैं कि हम किसी भी कीमत पर फैक्टरी को बंद नहीं होने देंगे. सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड की टेढ़ी नजर व बिहार इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के बकाया बिल व कंपनी के नाम पर माइनिंग लीज आदि ऐसे मामले सामने दिखाई दे रहे हैं, जो केसीएल के भविष्य के लिए अच्छे नहीं दिखते.
व्यवसाइयों के भी फंसे करोड़ों रुपये
केसीएल के उत्पाद को आम जनता तक पहुंचाने में लगे बड़े-बड़े व्यवसाइयों द्वारा सीमेंट की खरीदी के लिए लाखों रुपये एडवांस के रूप में फैक्टरी को दिया गया है. लोगों का मानना है कि वैसे दर्जनों बड़े व्यवसायियों के करोड़ों रुपये कंपनी के पास जमा है. वैसे व्यवसायी अपना रुपया फैक्टरी में जमा कर उत्पादन शुरू होने का इंतजार कर रहे है.
12 महीनों से नहीं मिला है मजदूरों को वेतन
इस फैक्टरी में कार्यरत करीब 650 स्थायी मजदूर व 250 अस्थायी मजदूरों को पिछले 12 माह से कोई वेतन नहीं मिला है. यही नहीं बीते छह साल से कंपनी में कार्यरत मजदूरों के पीएफ अकाउंट में कंपनी द्वारा कोई पैसा नहीं जमा कराया गया है. कंपनी में कार्यरत मजदूरों के संगठन कल्याणपुर सीमेंट कर्मचारी संघ के अध्यक्ष नवाब शरीफ, महामंत्री रिंकू सिंह, महासचिव नारायण राम, सदस्य लालू पासवान, उदय राम, अजीज अख्तर, बलराम पासवान, स्मिमुलाह, शंकर सिंह, अजय पासवान, भीखम पासवान, अनिल रजक, भूपेंद्र सिंह, कमला सिंह आदि का कहना है कि हम सभी मजदूर कंपनी प्रबंधन के साथ हैं. हमारी मांगे बस इतनी है कि हमें कम से कम एक माह के वेतन का तत्काल भुगतान किया जाये.
लग रहा अपनी कीमती जमीन को बेचने का आरोप
प्रबंधन द्वारा एक तरफ कंपनी को सिक इंडस्ट्री बताते हुए रुपये का रोना रोया जा रहा है. वहीं, दूसरी तरफ शहर में स्थित कीमती जमीनों को बेच कर करोड़ो रुपये बटोरने का आरोप लगाते हुए हिंद मजदूर सभा के प्रदेश सचिव नागेश्वर कहते हैं कि कंपनी के लाल बंगला स्थित छह व चुना भट्ठा मोड़ के पास स्थित 3.40 एकड़ जमीन को कडोरों में कंपनी द्वारा बेच दिया गया.
उससे प्राप्त राशि कंपनी के प्रबंधन के पास चली गयी परंतु, प्रबंधन द्वारा उक्त प्राप्त राशि में से मजदूरों के बकाया वेतन का न तो भुगतान किया गया आैर न ही उनके पीएफ में कोई राशि जमा करायी गयी. मजदूरों के वेतन से पीएफ के लिए काटी गयी राशि काे जमा नहीं कराया जाना मजदूरों के प्रति मैनेजमेंट के सौतेले व्यवहार है.
बकाया भुगतान के लिए प्रयत्नशील
इस बारे में कंपनी के ज्वाइंट प्रबंधक सीबी कुमार कहते हैं कि प्रबंधन मजदूरों के बकाया भुगतान के लिए प्रयत्नशील है. अभी फैक्टरी के बंद रहने से कैश का फ्लो नहीं है. जैसे हैं कंपनी में पुनः उत्पादन शुरू होगा व कैश का फ्लो होना शुरू होगा मजदूरों को उनके बकाया भुगतान धीरे-धीरे कर दिया जायेगा. इस दौरान उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि जो कुछ भी समस्याएं आयी है, वह जल्द ही दूर हो जायेगी व एक बार पुनः पूर्व की भांति फैक्टरी में उत्पादन शुरू हो जायेगा.
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