‘का हो चुन्नू बाबू, अपना पुरैनिया में अबकी दिमगवे हरा गया है’

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‘का हो चुन्नू बाबू, अपना पुरैनिया में अबकी दिमगवे हरा गया है’

चुनाव चर्चा

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चुनाव चर्चा

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पूर्णिया. ‘का हो चुन्नू बाबू, अपना पुरैनिया में अबकी केकर चांस है, का लग रहा है आपको… चाय की चुस्की लेते हुए सत्तो साह कुछ बोलना ही चाह रहे थे कि रज्जो बाबू बात काट दिए… अबकी त दिमगवा काम ही नहीं कर रहा… एतना तगड़ा मुकाबला तो पहले कभी नहीं हुआ. हां, ठीके कहते हैं रज्जो भाई, ननकू चौधरी को जैसे मौका मिल गया…अबकी कहना थोड़ा मुश्किल लग रहा है. सबकी बात सुन रहे सत्तो साह फिर टपक पड़े… अरे भाई मुश्किल उहे नहीं है… इहां त जेकरा पास जाइए उहे कहता है कि हम जीत रहे हैं… मामला त यही न उलझ रहा है. आखिर नन्दू भाई को रहा नहीं जाता तो धमक जाते हैं… अरे भाई नेताजी का असमनिया वादा सुनते रहिए… जो होगा अच्छा ही होगा.

दरअसल, आखिरी दौर में विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा में परवान चढ़ा हुआ है. मतदान में महजदो दिन शेष बचे हैं. नेताजी वोटरों को साधने के लिए जमकर प्रचार कर रहे हैं. वादों की लंबी-चौड़ी लिस्ट दिखा लोगों को गुमराह करने की कोशिश भी की जा रही है. पक्ष-विपक्ष दोनों ही दिन रात एक करके चुनावी प्रचार में डटे हुए हैं. इधर, चाय की दुकान और नुक्कड़ों पर अलग महफिल सज रही है जहां कोई किसी की बखिया उधेड़ रहा है तो किसी को हरा और जीता भी रहा है. चुनावी चर्चा में सुबह कोई हार रहा होता है तो शाम होते-होते जीत भी जाता है. राजू की चाय दुकान में जुटे लोग चाय की चुस्कियों के साथ कुछ इसी तरह चर्चा में मशगुल हैं.

चाय पीने आए बैंक के बड़ा बाबू वहां बैठे टुन्ना बाबू से मानो राय लेना चाह रहे हैं… ई माहौल में क्या फील कर रहे हैं पर टुन्ना बाबू जैसे बोलने के मूड में ही नहीं थे. कुरेदने पर चाय के पैसे देते हुए यह कहकर निकल गये कि फील की बात छोडि़ए जनाब, सोच-समझ कर वोट देने की अपनी जिम्मेदारी पूरा कीजिये… चुनाव-तुनाव तो ड्रामा है, हम लोग हमेशा से ठगाते आए हैं फिर ठगे जाएंगे बांकी हम सब भी रहेंगे और पूर्णिया भी रहेगा. टुन्ना बाबू तो निकल गये पर चर्चा शुरू होते ही कई लोग जुट गये. बड़ा बाबू बोले, भाई जी चाहे जो हो जाए हम सबको वोट जरुर देना चाहिए, काहे कि इससे परसेंटेज बढ़ेगा… अरे, ठीके कहे बड़ा बाबू, ई परसेंटेजवा बढ़ेगा तभिये न सही नेता चुना जाएगा… जरुर करेंगे वोट!

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अखिलेश चंद्रा

लेखक के बारे में

By अखिलेश चंद्रा

अखिलेश चंद्रा प्रिंट माध्यम में 30 और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. सामाजिक सरोकार, शिक्षा, अनुसंधान, राजनीति, कला-संस्कृति की खबरों में रुचि रखते हैं.

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