हमारे जिले में एक भी आदिवासी व मुसलमान कलेक्टर-एसपी नहीं : पप्पू यादव

Updated at : 31 Mar 2026 6:39 PM (IST)
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हमारे जिले में एक भी आदिवासी व मुसलमान कलेक्टर-एसपी नहीं : पप्पू यादव

संसद में सांसद ने उठाया आदिवास-अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का बड़ा सवाल

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संसद में सांसद ने उठाया आदिवास-अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का बड़ा सवाल पूर्णिया. लोकसभा में पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज की भागीदारी का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज भी कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर आदिवासी और मुसलमान समाज की भागीदारी बेहद कम है. उन्होंने विशेष रूप से अपने जिले का उदाहरण देते हुए कहा कि मेरे डिस्ट्रिक्ट में एक भी आदिवासी और एक भी मुसलमान कलेक्टर या एसपी नहीं है जो सामाजिक न्याय और समान अवसर के सवाल को गंभीर बनाता है. उन्होंने कहा कि जब तक वंचित समाज को निर्णय लेने वाली व्यवस्था में हिस्सेदारी नहीं मिलेगी, तब तक वास्तविक न्याय संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के समय से लेकर अब तक आदिवासियों की जमीन, जल, जंगल और संस्कृति पर लगातार दबाव बना है. सांसद ने कहा कि विकास के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों का दोहन किया गया, लेकिन वहां रहने वाले लोगों को उसका समुचित लाभ नहीं मिला. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आर्थिक आजादी के बिना किसी भी समाज के समग्र विकास की कल्पना नहीं की जा सकती, इसलिए आदिवासियों को संसाधनों पर अधिकार और आर्थिक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. सांसद पप्पू यादव ने समाधान के तौर पर कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए. उन्होंने कहा कि कार्बन क्रेडिट से होने वाली आय सीधे आदिवासी ग्राम सभाओं को मिले, ताकि जंगलों की रक्षा करने वाले लोगों को आर्थिक लाभ मिल सके. उन्होंने आदिवासी युवाओं को मातृभाषा में आधुनिक तकनीक जैसे एआई, कोडिंग, ड्रोन पायलटिंग और आधुनिक कृषि का प्रशिक्षण देने की बात कही, जिससे वे भविष्य के टेक्नोक्रेट बन सकें. साथ ही उन्होंने पारंपरिक जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प और कला को जीआई टैग दिलाकर वैश्विक बाजार से जोड़ने की आवश्यकता बताई. उन्होंने कहा कि समुदाय आधारित ईको-टूरिज्म, माइक्रो इंडस्ट्रियलाइजेशन और खनिज संसाधनों पर रॉयल्टी का हिस्सा सीधे स्थानीय लोगों के खातों में दिया जाना चाहिए. इससे आदिवासी समाज को मालिकाना हक और आर्थिक मजबूती मिलेगी. सांसद ने यह भी सुझाव दिया कि वन अधिकार कानून के तहत मिलने वाले पट्टों को डिजिटल और सुरक्षित बनाया जाए, ताकि भू-माफिया या भ्रष्टाचार से उनकी जमीन सुरक्षित रह सके.

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