निस्संतान को संतान के लिए जलालगढ़ में सजता है मां जीवच्छ का दरबार, 13 से 16 अप्रैल तक सिरवा मेला

Updated at : 02 Apr 2026 5:58 PM (IST)
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निस्संतान को संतान के लिए जलालगढ़ में सजता है मां जीवच्छ का दरबार, 13 से 16 अप्रैल तक सिरवा मेला

जलालगढ़

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निकेश कुमार, जलालगढ़. जीव के बदले जीव के रूप में ख्याति प्राप्त क्षेत्र की प्रसिद्ध मां जीवच्छ मंदिर ऐतिहासिक और मान्यताओं की प्रतीक बनी है. जीव के बदले जीव का अर्थ निःसंतान को संतान की प्राप्ति और चढ़ावा में पाठी का दान दिया जाना है. शक्ति एवं श्रद्धा की प्रतीक के रूप में मां जीवच्छ की मंदिर में चार दिनों तक चलने वाली मां जीवच्छ सिरवा मेला 13 अप्रैल से शुरू होगा. जलालगढ़ रेलवे स्टेशन से दो किमी दक्षिण वीरान क्षेत्र में स्थित यह मंदिर एक ऊंची टीले पर है. इसके तीनों ओर बड़े-बड़े पोखरें हैं. बताया जाता है कि इन पोखरों की पानी अबतक कभी नहीं सूखा है. मंदिर से सटे ठीक उत्तर जीवच्छ पोखर, पूरब-उत्तर छोड़ पर ऐतिहासिक गंगा सागर, दक्षिण छोड़ पर मरोच्छ पोखर है. रमणीक दृश्य और शक्तिपीठ की यह स्थल आस-पड़ोस के क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है. यहां प्रत्येक वर्ष 13 से 16 अप्रैल तक मां जीवच्छ सिरवा मेला का आयोजन होता है. जो इस क्षेत्र के लिए ही नहीं बल्कि सीमांचल में काफी प्रसिद्ध है. संतान प्राप्ति को पोखर में स्नान और फिर ध्यान करने की पंरपरा मंदिर से जुड़ी कई किवदंती है. क्षेत्र के पंडित चंद्रशेखर ठाकुर बताते हैं कि मरोच्छ नामक एक महिला जिसे कोई संतान नहीं थी. निस्संतान होने के कारण उसे समाज में बांझ मरोच्छ के नाम से पुकारे जाने लगा. जिसे सुन मरोच्छ काफी दुखी रहती. बताया जाता है कि बांझ का ताना सुन-सुनकर वह मंदिर से सटे पोखर में कूदकर अपनी जान दे दी. वहीं किसी को स्वप्न आया कि इस पोखर में जो भी निसंतान दम्पति स्नान कर पोखर से सटे मंदिर में पूजन करेगा उसे संतान प्राप्ति होगी. जिसके बाद यह कथा क्षेत्र में फैल गई और निसंतान को संतान होने के बाद पाठी(बकरी) चढ़ावा के रूप में चढ़ाते हैं. मंदिर से सटे पोखर को जीवच्छ पोखर और इस मंदिर को मां जीवच्छ मंदिर के नाम से जानते हैं. संतान होने पर यहां कराते हैं मुंडन इस स्थान पर चार दिनों तक मेला लगती है. मेले में धान के लावा से तैयार खोय(ओखरा) काफी प्रसिद्ध है. मंदिर में चढ़ावा के लिए अधिकांश श्रद्धालु इलाइची दान, बतासा का भोग लगाया जाता है. निसंतान औरतें मां जीवच्छ के पोखर में स्नान कर संतान के लिये मन्नत मांगती है. जिसको इसकी प्राप्ति होती है वह मां के मंदिर में पाठी चढ़ाते हैं. प्रत्येक वर्ष यहां चार दिनों में 350 से 400 पाठी का चढ़ावा होता है. सबसे बड़ी बात यह है कि यहां पाठी की बलि नहीं दी जाती है. श्रद्धालु विविध मन्नते पूरा होने पर स्वर्ण,चांदी के आभूषण भी मां को समर्पित करते हैं. साथ ही जिनको सन्तान की मन्नत पूरी होती है तो मुंडन इसी जीवच्छ पोखर के घाट पर करातें है. सौहार्द की अदभुत मिसाल होती कायम हिंदू के साथ साथ मुस्लिम समाज के श्रद्धालु भी पूजा अर्चना के लिए पहुचते हैं. यहाँ हिन्दू, मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग घाट पर पूजा करते है और घाट पर श्रद्धालुओं को तिलक लगाने का कार्य वर्षों से परंपरा के रूप में निभाते आ रहे हैं. इस स्थान पर जलालगढ़ क्षेत्र के अलावे गढ़बनैली, कसबा, अमौर, श्रीनगर, पूर्णिया, फारबिसगंज, अररिया, रानीगंज, जोगबनी, कटिहार, किशनगंज, नेपाल, बंगाल के मालदा, दालकोला आदि स्थानों के श्रद्धालु चढ़ावा और मन्नते के लिए पहुंचते हैं. मेला की बंदोबस्ती करीब 4 लाख, पर अदद सड़क भी नदारद श्रद्धालु बताते हैं कि मां जीवच्छ मंदिर तक जाने के लिए सुगम रास्ता और अन्य मूलभूत सुविधाओं की जरूरत है. बता दें कि आस्था मां जीवच्छ मंदिर का प्रति वर्ष जीवच्छ सिरवा के नाम से वित्तीय वर्ष के लिए बंदोबस्ती होती है. पहले यह बंदोबस्ती अपर समाहर्ता की निगरानी में होती थी लेकिन पिछले तीन वर्षों से जिला परिषद कार्यालय में होती है. वर्ष 2026-27 के लिए तीन लाख 70 हजार में हुई, निबंधन शुल्क सहित बंदोबस्ती तीन लाख 99 हजार 600 रुपये में हुई. प्रत्येक वर्ष यह राशि बढ़ती ही जाती है. पर मंदिर तक जाने के लिए कोई सुगम रास्ता एवं अन्य सुविधाओं पर किसी का ध्यान नहीं है. दो साल पहले तत्कालीन डीएम ने विकास का दिया था भरोसा 12 मार्च 2024 को पूर्णिया के तत्कालीन जिला पदाधिकारी कुंदन कुमार माता स्थल पहुंचे थे. जिन्होंने मंदिर व जीवच्छ पोखर के सौंदर्यीकरण की बात विभागीय स्तर पर करने की बात कही थी. इसे लेकर लोगों को अब भी बड़ी उम्मीदें हैं. वे जिला प्रशासन से बड़ी योजना की अपेक्षा रखते हैं.

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