मन्नत पूरी होने पर उड़ाए जाते हैं कबूतर, आस्था का केंद्र है बेलौरी शीतला मंदिर

Published by : Shruti Kumari Updated At : 20 May 2026 10:52 AM

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बेलौरी स्थित शीतला माता मंदिर

बेलौरी का यह मंदिर विशेष रूप से गंभीर रोगों से मुक्ति दिलाने की मान्यता के लिए प्रसिद्ध है. हर वर्ष शीतलाष्टमी के अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.

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पूर्णिया से अखिलेश चन्द्रा की रिपोर्ट:

पूर्णिया: शहर के बेलौरी स्थित शीतला माता मंदिर आस्था, विश्वास और आरोग्य का प्रमुख केंद्र माना जाता है. रेलवे गुमटी के समीप स्थित इस प्राचीन मंदिर में देश-विदेश से श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा से मां शीतला की पूजा करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु यहां कबूतर उड़ाकर और बलि अर्पित कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

बेलौरी का यह मंदिर विशेष रूप से गंभीर रोगों से मुक्ति दिलाने की मान्यता के लिए प्रसिद्ध है. हर वर्ष शीतलाष्टमी के अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.

रोगों से मुक्ति की है मान्यता

मंदिर में माता शीतला की प्रतिमा गर्दभ (गधे) पर सवार स्वरूप में विराजमान है. माता की चार भुजाओं में सूप, झाड़ू, नीम की पत्तियां और कलश सुशोभित हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार माता का यह स्वरूप चेचक, खसरा, नेत्र रोग और अन्य गंभीर बीमारियों से रक्षा करने वाला माना जाता है.

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार मंदिर की स्थापना वर्ष 1948 में स्वर्गीय रूहिणी कविराज ने उस समय की थी, जब इलाके में महामारी फैली हुई थी. कहा जाता है कि उस दौरान बड़ी संख्या में लोग यहां आकर स्वस्थ हुए थे. आज भी श्रद्धालुओं के बीच यह आस्था कायम है कि माता के चरणों में अर्पित जल का छिड़काव करने से रोगों में लाभ मिलता है.

शीतलाष्टमी पर लगता है भव्य मेला

मंदिर स्थापना काल से ही यहां शीतलाष्टमी पर मेला आयोजित होता आ रहा है. होली के आठवें दिन लगने वाले इस एक दिवसीय मेले में विशेष पूजा-अर्चना, बलि प्रथा और कबूतर उड़ाने की परंपरा निभाई जाती है.

मेले के दौरान खिचड़ी महाभोग का आयोजन भी आकर्षण का केंद्र रहता है. श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण के लिए करीब 20 क्विंटल चावल की खिचड़ी तैयार की जाती है. इस मेले में बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा नेपाल, पश्चिम बंगाल, असम और भूटान से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं.

मेहमाननवाजी की अनोखी परंपरा

मंदिर के आसपास बसे परिवार मेले के दौरान श्रद्धालुओं की मेहमाननवाजी में जुट जाते हैं. दूर-दराज से आने वाले भक्त एक दिन पहले पहुंचकर स्थानीय लोगों के घरों में ठहरते हैं. मंदिर कमेटी के सदस्य रीतेन दास बताते हैं कि श्रद्धालुओं के भोजन और ठहरने की व्यवस्था सेवा भाव से की जाती है.

मेले की सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए स्थानीय स्वयंसेवकों के साथ बाहरी स्वयंसेवकों की भी तैनाती की जाती है.

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