नाटक के माध्यम से कलाकारों ने शोषण व दहेज प्रथा पर किया प्रहार

Updated at : 30 Mar 2026 6:49 PM (IST)
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नाटक के माध्यम से कलाकारों ने शोषण व दहेज प्रथा पर किया प्रहार

चैती दुर्गा पूजा के अवसर पर भरत नाट्य कला केंद्र (भनक) और नवयुवक नाट्य कला परिषद लक्ष्मीनिया के द्वारा दो दिवसीय पारसी नाट्य समारोह का आयोजन किया गया.

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पूर्णिया. चैती दुर्गा पूजा के अवसर पर भरत नाट्य कला केंद्र (भनक) और नवयुवक नाट्य कला परिषद लक्ष्मीनिया के द्वारा दो दिवसीय पारसी नाट्य समारोह का आयोजन किया गया. इसमें क्रमशः गरीबों को जीने दो और मिटा डालो दहेज के लुटेरों को नामक दो नाटकों का मंचन किया गया. लक्ष्मीनिया में मंचित दोनों नाटकों के निर्देशक डॉ विभूति थे. वहीं मंच संचालन परमानंद प्रसून कर रहे थे. पहली प्रस्तुति गरीबों को जीने दो नाटक में दिखाया गया कि पूंजीपतियों के द्वारा गरीबों को किस प्रकार से दबाया जाता है और उनके अधिकारों का हनन कर किस प्रकार उनपर झूठा मुकदमा चला कर उनका शोषण किया जाता है. इस नाटक के कलाकारों में नायक की भूमिका में मृत्युंजय कुमार, पूंजीपति की भूमिका में कुणाल कुमार, देश भक्त की भूमिका में चंदन कुमार, जज की भूमिका में अंकित प्रजापति, संतोष कुमार, शंभू मंडल, अरविंद मंडल, राजेश मंडल, मुकेश कुमार अखिलेश कुमार, सूरज आदि शामिल रहे जबकि दूसरी प्रस्तुति मिटा डालो दहेज के लुटेरों को नाटक में दहेज के लिए बहु को प्रताड़ित किये जाने और ससुराल वालों द्वारा दहेज लेने के बाद भी बहु की हत्या कर देने जैसे सामाजिक अपराध को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया. नाटक में नायक की भूमिका में अजय कुमार, चंदन सिंह, संतोष, राजेश, गौरी शंकर, लखन भगत, कुंदन कुमार, सूरज, अंकित प्रजापति, छांगुरी, अखिलेश, रंजीत आदि कलाकारों ने अपनी भूमिका बेहतरीन ढंग से निभायी जिसकी दर्शकों ने भूरी भूरी प्रशंसा की. वहीं रूप सज्जा में अशोक मंडल, सियाराम मंडल, जयराम मंडल, सच्चिदानंद मंडल, सुरेंद्र मंडल की महती भूमिका रही. प्रकाश योजना दीपक कुमार और ध्वनि प्रभाव सुमन कुमार का था. भनक के सचिव सह निदेशक, भिखारी ठाकुर सम्मान प्राप्त वरिष्ठ रंगकर्मी उमेश आदित्य ने बताया कि भरत नाट्य कला केंद्र की योजना ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यशाला आयोजित कर आधुनिक रंगमंच की ओर कलाकारों का ध्यान आकर्षित कराना है. उन्होंने बताया कि गांवों में पारसी शैली के नाटकों की एक समृद्ध परंपरा है जो आज तक जीवित है और यह ग्रामीणों के मनोरंजन का साधन बना हुआ है.

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SATYENDRA SINHA

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