जब कोई मौत में दिखाये दिलचस्पी, तो समझ लीजिए आत्महत्या का इरादा

Updated at : 11 Oct 2019 8:40 AM (IST)
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जब कोई मौत में दिखाये दिलचस्पी, तो समझ लीजिए आत्महत्या का इरादा

पूर्णिया : अगर कोई आपका करीबी या परिचित अचानक मौत में दिलचस्पी दिखाने लगे तो समझ लीजिए कि उसकी मानसिक स्थिति गड़बड़ है और उसने आत्महत्या का ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया है. ऐसी स्थिति में आत्महत्या से बचाव के लिए उसकी क्षमता और गुणों से रूबरू कराने की जरूरत है. गुरुवार को सदर अस्पताल […]

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पूर्णिया : अगर कोई आपका करीबी या परिचित अचानक मौत में दिलचस्पी दिखाने लगे तो समझ लीजिए कि उसकी मानसिक स्थिति गड़बड़ है और उसने आत्महत्या का ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया है. ऐसी स्थिति में आत्महत्या से बचाव के लिए उसकी क्षमता और गुणों से रूबरू कराने की जरूरत है.

गुरुवार को सदर अस्पताल में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी के दौरान इस साल की थीम सुइसाइड प्रिवेंशन यानी आत्महत्या से बचाव पर मनोरोग विशेषज्ञों और चिकित्सकों ने अपने-अपने विचार रखे. संगोष्ठी में एसीएमओ डॉ सुभाषचंद्र पासवान ने कहा कि मानसिक रोगों से बचाव के लिए शांति और व्यवस्था बेहद जरूरी है.
घर, परिवार और समाज में शांति और व्यवस्था का ख्याल रखा जाये तो आत्महत्या की नौबत ही नहीं आयेगी. संगोष्ठी में डॉ. वी पी अग्रवाल, डॉ. एस के वर्मा, डॉ. विजय चौधरी, डॉ. राजीव कुमार रंजन, मनोचिकित्सक डॉ. आर के भारती आदि ने विचार व्यक्त किये. संगोष्ठी में जोएनल एबी, नीतू कुमारी, नवल किशोर शर्मा,विद्यानंद आदि ने भाग लिया.
इलाज के लिए आवश्यक दवाएं व विशेषज्ञ उपलब्ध : अनुश्रवण एवं मूल्यांकन पदाधिकारी जितेन्द्र कुमार ने कहा कि मानसिक रोगियों के इलाज के लिए सदर अस्पताल में 10 प्रकार की आवश्यक दवाएं और विशेषज्ञीय परामर्श उपलब्ध है. मानसिक रोगियों के उपचार के साथ-साथ उनके कौशल का भी आकलन किया जाता है ताकि वे समाज की मुख्यधारा में रहकर अपनी जिंदगी सहजता से बिता सकें.
संगोष्ठी की मुख्य बातें
महिलाओं में मानसिक समस्याएं सबसे ज्यादा
अभिभावकों की नासमझी से बच्चे भी अवसाद के शिकार
आत्महत्या की दर में हो रहा इजाफा
जागरूकता के अभाव में मानसिक रोग के प्रति अज्ञानता
शारीरिक, मानसिक व आत्मीय रूप से स्वस्थ ही सेहतमंद
बच्चों की क्षमता के अनुरूप ही अभिभावक करें अपेक्षा
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. पल्लव कुमार ने कहा कि हरेक अभिभावक को चाहिए कि वे अपने बच्चों की क्षमता व योग्यता के अनुरूप ही उनसे अपेक्षा करें. पढ़ाई व नौकरी में बच्चों से जरूरत से ज्यादा अपेक्षा करना आत्मघाती कदम हो सकता है.
उन्होंने कहा कि अवसाद की स्थिति काफी गंभीर होती है. इसमें दवा से ज्यादा परिजनों का सहारा कारगर होता है. उन्होंने कहा कि मानसिक रोगों में दवा और काउंसेलिंग से इलाज पूरी तरह से संभव है. वह गुजरे जमाने की बात है जब बिजली के झटके से इलाज किया जाता था.
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