अपनों की याद से मुक्ति को नहीं मिल रही मुक्ति
Updated at : 18 Aug 2018 2:56 AM (IST)
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पूर्णिया : उनकी उम्र जब 60 हो गयी तो उनके बच्चों ने ठुकरा दिया. उनकी जीवन संगिनी बीबी भी अब इस दुनिया में नहीं है. पांव भी कब्र में लटक रहे हैं. लाचार होकर वृद्धाश्रम में आये हैं. किसी तरह जीवन का समय कटा रहे हैं. एक-एक दिन पहाड़ जैसा लगता है. ऊपर से अपनों […]
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पूर्णिया : उनकी उम्र जब 60 हो गयी तो उनके बच्चों ने ठुकरा दिया. उनकी जीवन संगिनी बीबी भी अब इस दुनिया में नहीं है. पांव भी कब्र में लटक रहे हैं. लाचार होकर वृद्धाश्रम में आये हैं. किसी तरह जीवन का समय कटा रहे हैं. एक-एक दिन पहाड़ जैसा लगता है. ऊपर से अपनों की याद उसे इस कदर साल रही है कि सोचते-सोचते वे निष्प्राण से हो जाते हैं.
जिस शख्स की बात हो रही है उसका नाम है मुक्ति प्रसाद साह. वे मूल रूप से कसबा निवासी हैं. उनका भरा पूरा परिवार है. वासडीह गोतिया लोगों के झमेले में चली गयी है और उससे वे बेदखल हैं. दो बेटे हैं. दोनों परदेस में रोजी-पानी कर रहे हैं. वे लोग एक पिता को नहीं रख पा रहे हैं.
बेटी भी एकमात्र पिता को पनाह देने में सक्षम नहीं हो पा रही है. सहोदर भाई भी बेगाना हो गया. वे दिनभर फफकते रहते हैं. कल तक वे दुनिया को बेगाना कहते थे. वर्षों तक बेटे-बेटी एवं भाई को दोषी बताते रहे. उन्होंने प्रशासन से भी गुहार लगायी लेकिन उनकी वासडीह का मामला नहीं सुलझा.
समाज ने भी उनसे मुंह फेर लिया. धर्मपत्नी भी उनका साथ छोड़कर सदा के लिए चल बसी. अब उनको किसी से कोई शिकायत नहीं है. अब उन्हें महसूस हो गया है कि इस दुनिया में इंसान तो इंसान की क्या बिसात अब तो भगवान भी उनसे रूठ गये हैं. अब अपना नसीब और नियति वृद्धाश्रम की कोठरी को ही मान लिया है.
उनसे मिलकर आपको ऐसा नहीं लगेगा कि वे दुखी हैं. वे पढ़े लिखे हैं. एक समय एक वित्त रहित कॉलेज में भी काम कर चुके हैं. उनका कहना है कि अब जिंदगी के चंद दिन बचे हैं. कोशिश करते हैं कि तनावमुक्त होकर जीवन को आनंदमय रखकर समय बिता लें.
दिनभर टीवी के सामने समय कट जाती है, लेकिन रात के काले साये में यादों की बारात की लंबी कतार लग जाती है. चंद मिनट पहले उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी.
इस संवाददाता से अपनी दर्द
बयां करते-करते वे इस कदर फफकने लगे कि वहां का माहौल ही गमगीन हो गया. अंदर से रोना और दूसरों के सामने बनावटी हंसी शो करना अब उनकी रूटीन में आ गया है.
हालांकि चलते-चलते उन्होंने अपनी बात जिस तरह से रखी वह कोई साधक ही रख सकता है. उन्होंने कहा आवश्यकता से ज्यादा सरल स्वभाव का होना ही उनके जीवन काल के अंतिम समय में दुख का कारण बन गया.
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