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Teachers Day: खुद की पढ़ाई छूटी तो दूसरों के सपनों को पंख देने लगीं जीविका महिलाएं, 5-5 रुपये से जुटाए 14 लाख

Updated at : 05 Sep 2025 1:02 PM (IST)
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Missed Their Own Studies, Now Giving Wings to Others’ Dream

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Teachers Day: कभी खुद किताबें हाथ में लेने का मौका न मिल पाया, मगर अब वही महिलाएं दूसरे सपनों को पंख दे रही हैं. गांव-गांव से जुटाए पांच-पांच रुपये आज 14 लाख में बदल गए हैं और इस राशि से सैकड़ों महिलाएं पढ़ाई की नई राह पर चल पड़ी हैं.

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Teachers Day: शिक्षा की लौ जलाने के लिए न उम्र रुकावट बनी, न हालात. जिले की हजारों महिलाएं संगठित होकर अपने जैसी ही दूसरी महिलाओं को पढ़ाने का अभियान चला रही हैं. जीविका से जुड़ी इन महिलाओं ने विद्या निधि बनाकर हर महीने पांच-पांच रुपये जमा किए और इस छोटी-सी पहल से अब तक 14 लाख रुपये इकट्ठा कर लिए.

यही राशि आज उन महिलाओं की पढ़ाई पर खर्च हो रही है, जो 40–50 की उम्र पार कर चुकी हैं लेकिन अभी भी किताबों के सपनों को जीना चाहती हैं.

जब अनपढ़ महिलाओं ने थामा शिक्षा का जिम्मा

लगभग 40 हजार महिलाएं विद्या निधि दान के तहत पांच-पांच रुपये जमा करती हैं. पहले यह राशि बच्चों की पढ़ाई में मदद के लिए इस्तेमाल होती थी. लेकिन जब यह समझ आया कि शिक्षा सिर्फ अगली पीढ़ी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, तो महिलाओं ने खुद को पढ़ाने का संकल्प लिया.
इस पहल से अब तक दो साल में 80 से अधिक महिलाएं मैट्रिक पास कर चुकी हैं. इस वर्ष 100 से ज्यादा महिलाओं ने नामांकन कराया है.

शाम का स्कूल, दिन का संघर्ष

दिनभर खेत, घर और कामकाज में व्यस्त रहने वाली ये महिलाएं शाम को एक जगह जुटती हैं. वहां शिक्षक रखे गए हैं, जिनकी सैलरी इन्हीं महिलाओं के फंड से दी जाती है. एनआईओएस (National Institute of Open Schooling) के जरिए उन्हें परीक्षा दिलाई जाती है.
रीना देवी (45) बताती हैं, “शुरुआत में शर्म आती थी, मगर अब लगता है कि स्कूल का सपना इस उम्र में पूरा हो रहा है. हम किताबें पढ़ते हैं, एक-दूसरे से सवाल पूछते हैं. सच कहें तो हम सबकी उम्र भले अलग हो, लेकिन दिल से हम फिर से छात्रा बन गए हैं.”

गुरु भी बनीं, छात्रा भी

इस मुहिम की सबसे खास बात यह है कि जो महिलाएं मैट्रिक पास कर लेती हैं, वे ही अगली बैच की ‘गुरु’ बन जाती हैं. 50 वर्षीय कांती देवी कहती हैं, “हम पढ़ाई पूरी करके अब दूसरों को पढ़ा रहे हैं. कभी सोचा नहीं था कि हम खुद टीचर कहलाएंगे.”
यह अनूठा मॉडल महिलाओं को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास भी दे रहा है.

14 लाख की विद्या निधि

महिलाओं की इस यात्रा की अगुआई कर रही मीना देवी बताती हैं, “हम जीविका से जुड़े तो कमाने का तरीका सीखा. फिर लगा कि पढ़ाई के बिना जिंदगी अधूरी है. इसलिए हमने विद्या निधि शुरू की. हर महिला पांच-पांच रुपये देती रही और धीरे-धीरे आज हमारे पास 14 लाख रुपये जमा हो गए हैं. इसी पैसे से महिलाओं के लिए शिक्षक रखे गए और क्लासेस चलाई जा रही हैं.”

ज्यादातर महिलाएं दादी-नानी की उम्र की हैं. उनके बच्चों के भी बच्चे हो चुके हैं, लेकिन पढ़ाई की ललक अभी भी जीवित है. यह अभियान साबित करता है कि पढ़ने-लिखने की कोई उम्र नहीं होती. गांव की महिलाओं का कहना है कि जब वे किताबें खोलती हैं तो उन्हें लगता है कि उनके भीतर की अधूरी ख्वाहिश पूरी हो रही है.

समाज में बदलती सोच,टीचर्स डे पर खास संदेश

इस प्रयास ने गांवों में एक नई सोच पैदा की है. पहले बड़ी उम्र की महिलाओं को किताबें उठाते देखकर लोग हंसते थे. अब वही लोग उनका हौसला बढ़ाते हैं. गांव की बच्चियां कहती हैं कि जब हमारी मां और दादी पढ़ाई कर सकती हैं तो हमें भी शिक्षा को गंभीरता से लेना चाहिए.

इन महिलाओं का यह अभियान साबित करता है कि गुरु सिर्फ वही नहीं होता जो किसी स्कूल या कॉलेज में पढ़ाता है. कोई भी व्यक्ति जो ज्ञान साझा करे और दूसरों को आगे बढ़ाए, वही असली शिक्षक है. इस टीचर्स डे पर ये महिलाएं समाज को यह संदेश दे रही हैं कि शिक्षा की लौ किसी भी उम्र में जलाई जा सकती है और यह लौ न सिर्फ जीवन को रोशन करती है बल्कि दूसरों का रास्ता भी उज्ज्वल बनाती है.

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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