सायरन बजते ही फिर ताजा हो गयीं 1971 भारत-पाक युद्ध की यादें, पढ़िए कैसा था तब मंजर

1971 India vs Pakistan war
Operation Sindoo 1971 भारत-पाक युद्ध की यादों को शेयर करते हुए कई बुजुर्गों ने बताया कि मॉक ड्रिल की घोषणा से कई पुरानी बातें याद आने लगी हैं. बुजुर्गों की मानें, तो उस समय सेना में बहाली का खुला ऑफर जैसा था. देशभक्ति के जज्बे के साथ बहुत सारे युवाओं की भर्ती भी ली गयी थी.
अखिलेश चंद्रा, पूर्णिया
Operation Sindoor भारत-पाकिस्तान के बीच जारी तनाव के बीच किसी भी आपात स्थिति से निबटने के लिए बुधवार की शाम शहरी क्षेत्र में मॉक ड्रिल आयोजित किया. इसके तहत दस मिनट तक पूरा शहर ब्लैक आउट हो गया. यह ड्रिल युद्ध जैसे हालात में नागरिक सुरक्षा और आपातकालीन तैयारियों की जांच के लिए किया जाता है. पूर्णिया वासियों ने इससे पहले 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय ब्लैक आउट अनुभव किया था.
पूर्णियावासी 78 वर्षीय अधिवक्ता प्रणव कुमार सिन्हा उस दौर के साक्षी रहे हैं. करीब 54 साल पहले के माहौल का जिक्र करते हुए सिन्हा स्मृतियों में खो जाते हैं. कहते हैं, तब मेरी उम्र 23-24 के बीच रही होगी. युद्ध की घोषणा हो चुकी थी और सतर्कता के लिए कई निर्देश दिये गये थे. शाम में हर रोज सात से आठ के बीच सायरन बजता था और सायरन बजते ही हम सब घरों में दुबक जाते थे. सभी लाइटें बंद कर दी जाती थीं. बहुत जरूरत पड़ने पर घर के अंदर मोमबत्ती भी इस कदर सम्भल कर जलाया जाता था कि बाहर हल्की रोशनी भी न जा सके.
जगह-जगह ट्रेंच खुदवाया गया था
मुझे याद है कि उस समय जगह-जगह ट्रेंच खुदवाया गया था ताकि बम गिरने की स्थिति में जान बचायी जा सके. घरवालों का पहरा इतना कड़ा होता था कि बाहर भी नहीं निकल पाते थे. तब अजीब सा माहौल था. उस समय एयरफोर्स स्टेशन का बेस बन गया था और हैंगर में प्लेन रहते थे. क्या उस समय कोई ट्रेनिंग भी दी गयी थी ? पूछने पर श्री सिन्हा माथे पर जोर देते हुए कहते हैं कि बहुत याद तो नहीं आ रहा है, पर इतना याद है कि आर्म्स की ट्रेनिंग दी जाती थी और इसके लिए लोग पूर्णिया काॅलेज के पास जुटते थे.
सायरन की आवाज सुन बढ़ जाती थीं धड़कनें
बैंक की नौकरी से रिटायर्ड 75 वर्षीय रमेश मिश्र भी सन् 1971 के हालात पर चर्चा करते हुए सिहर उठते हैं. कहते हैं कि वे उस समय पूर्णिया काॅलेज के छात्र थे. काॅलेज में धमका सुनने पर जमीन पर लेट जाने, खोदे गये गड्ढों में छिप जाने आदि के बचाव के लिए प्रशिक्षण दिये गये थे. उन दिनों की याद करते हुए श्री मिश्र बताते हैं कि उनके पिताजी की डिस्पेंसरी कलेक्ट्रेट के सामने थी और वहां यह बताया गया था कि घबराने की बात नहीं है.
सिर्फ एहतियात बरतना है. इसके बावजूद सायरन की आवाज से ही दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. वे बताते हैं कि पिताजी ने समझाया था कि पाकिस्तान से युद्ध शुरू हो गया है और सायरन सुरक्षा के लिए बजाया जाता है. मुझे याद है कि सायरन बजने से पहले ही घरों की बत्ती बुझा दी जाती थी. घर से बाहर नहीं निकलते थे. सड़कें सुनसान रहती थीं. उस समय काॅलेज में एनसीसी वालों को बंदूक चलाने की भी ट्रेनिंग दी जा रही थी. उस समय आरएनसाव चौक,थाना चौक और गिरिजा चौक पर अजीब किस्म का सायरन बजता था.
बहुत सारे युवा हुए थे सेना में भर्ती
दरअसल, शहर में कई ऐसे लोग आज भी हैं, जिनकी आंखों में वह दृश्य तैर रहा है, जब पाकिस्तान के साथ युद्ध शुरू हुआ था. कालांतर में पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना. कई बुजुर्गों ने बताया कि मॉक ड्रिल की घोषणा से कई पुरानी बातें याद आने लगी हैं. बुजुर्गों की मानें, तो उस समय सेना में बहाली का खुला ऑफर जैसा था. देशभक्ति के जज्बे के साथ बहुत सारे युवाओं की भर्ती भी ली गयी थी.
बुजुर्गों ने बताया कि उस जमाने में जहां 10 लोग जुटते थे, वहीं भारत माता की जय के नारे लगने लगते थे. उस समय युद्ध का समाचार सुनने को हर कोई बेताब रहता था. तब रेडियो ही इसका बड़ा माध्यम था और वह सबके पास नहीं होता था. खोजकर लोग रेडियो वालों के घर या दुकान पर जुटते थे.
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By RajeshKumar Ojha
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