एशियन टाइगर मच्छर के डंक से होते हैं डेंगू व चिकनगुनिया

Updated at : 20 Aug 2024 1:29 AM (IST)
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एशियन टाइगर मच्छर के डंक से होते हैं डेंगू व चिकनगुनिया

विश्व में मच्छरों की करीब 3500 प्रजातियां हैं. बिहार में इसकी चंद प्रजातियों से ही हर साल तबाही मचती है.

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शशिभूषण कुंवर,पटना विश्व में मच्छरों की करीब 3500 प्रजातियां हैं. बिहार में इसकी चंद प्रजातियों से ही हर साल तबाही मचती है. मच्छरों का प्रकोप ऐसा है कि अभी तक एक प्रजाति के मच्छर पर भी नियंत्रण नहीं पाया जा सका है. बिहार में एशियन टाइगर प्रजाति के मच्छर अधिक खतरनाक होते हैं. यह एक साथ कई बीमारियों को फैलाता है. आमतौर पर एशियन टाइगर मच्छर के शरीर पर चांदी- सी धारी होती है जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है. साधारण भाषा में इसे एडिज मच्छर भी कहा जाता है. यह मच्छर सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त के पहले सक्रिय होता है. लेडीज एशियन टाइगर मच्छर ही डेंगू को फैलाता है और सितंबर माह इसके लिए सबसे उपयुक्त समय होता है. बिहार में मच्छरों के डंग से कई प्रकार की बीमारियां फैलती हैं. इसी में एक बीमारी है एनोफिलिज मच्छर. इसकी 430 प्रजातियां हैं, जिसमें सिर्फ 30-40 प्रजाति के मच्छर ही बीमारी फैलाते हैं. मदा एनोफिलिज मच्छर के डंक से मलेरिया की बीमारी होती है. मदा एनोफिलज मच्छर का चरित्र ऐसा है कि वह सूर्योदय के पहले डंक मारती है या सूर्यास्त के तुरंत बाद. यह अपने अंडे को पालने के लिए डंक मारती है और मनुष्य में मलेरिया की बीमारी होती है. इसी मच्छर की खोज 20 अगस्त, 1897 को ब्रिटिश चिकित्सक सर रोनाल्ड रॉस द्वारा किया गया था. इसी कारण हर 20 अगस्त को विश्व मच्छर दिवस मनाया जाता है. बिहार में क्यूलेक्स मच्छर भी पाया जाता है.क्यूलेक्स मच्छर के काटने के बाद इंसानों में फाइलेरिया की बीमारी होती है. इसमें हाथीपांव, हाइड्रोसील में सूजन और स्तन में सूजन जैसी बीमारी होती है जो आजीवन रहती है. बिहार कालाजार से हाल में ही उबरा है. कालाजार को फैलानेवाली सैंड फ्लाइ (बालू मक्खी) होती है. इस मच्छर का चरित्र है कि यह सूर्यास्त के बाद मध्यरात्रि और सूर्योदय के पहले डंक मारती है. इसी प्रकार से जेपनिज इंसेफ्लाइटिस (जेइ) क्यूलेक्स मच्छर के काटने से होता है. यह मच्छर सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के समय डंक मारता है. राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी डाॅ अशोक कुमार ने बताया कि मच्छर जनित बीमारियों से बचाव ही बेहतर उपाय है. अपने आसपास पानी जमा नहीं होने दें, जिससे मच्छरों को पनपने का अवसर ही नहीं मिल सके. जेइ और फाइलेरिया की वैक्सीन व दवा उपलब्ध राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी (वेक्टर रोग) डाॅ अशोक कुमार ने बताया कि जेपनिज इंसेफ्लाइटिस (जेइ) से बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध है. यह सभी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में उपलब्ध होती है. इसके अलावा फाइलेरिया से बचाव के लिए मास ड्रग एडिमिनस्ट्रेशन (एमडीए) अभियान साल में दो बार चलाया जाता है. मलेरिया और कालाजार से बचाव के लिए दवा का छिड़काव कराया जाता हैए जिससे मच्छरों का प्रकोप कम होता है.

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