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पारंपरिक खेती की ओर लौटेगा बिहार, नीतीश सरकार के प्लान में लागत कम, मुनाफा ज्यादा

Updated at : 28 Jan 2025 10:24 AM (IST)
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Agriculture News

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Traditional Farming: केंद्र सरकार ने पारंपरिक खेती को किसानों के लिए आत्मनिर्भर मॉडल के रूप में विकसित करने के लिए मिशन शुरू किया है. पारंपरिक खेती में लागत कम है, किसान अधिक कमा सकते हैं.

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Traditional Farming: पटना. बिहार में किसानों को पारंपरिक खेती के लिए प्रोत्साहित करने का नीतीश सरकार ने मेगा प्लान बनाया है. कृषि विभाग ने कार्य योजना भी तैयार कर ली है. इसका मकसद पारंपरिक खेती की ओर लौटना, खेती की लागत को कम करना और मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता को बचाए रखना है, जो केमिकल्स के इस्तेमाल से काफी खराब हो रही थी. कार्ययोजना में क्लस्टर मोड में पूरे जिले में लगभग 17,500 एकड़ भूमि पर पारंपरिक खेती का प्लान है. विभाग ने 350 क्लस्टर स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है. हर क्लस्टर में 125 किसान होंगे.

53 करोड़ का बजट आवंटित

विभागीय जानकारी के अनुसार सरकार पहले चरण में हर जिले में पारंपरिक खेती में लगे किसानों के कम से कम आठ से दस समूहों को समर्थन देने का लक्ष्य रख रहे हैं. राज्य कृषि विभाग ने पारंपरिक खेती के लिए कार्य योजना केंद्र को सौंप दी है, जिसने परियोजना को मिशन मोड में शुरू करने की योजना बनाई है. केंद्र सरकार ने पारंपरिक खेती को
प्रोत्साहित करने के लिए 53 करोड़ का बजट आवंटित किया है, जिसमें राज्य का हिस्सा भी शामिल है. यह योजना दो साल-2024-25 और 2025-26 के लिए बनायी गयी है.

पारंपरिक खेती और जैविक खेती के बीच अंतर

पारंपरिक खेती और जैविक खेती के बीच अंतर के बारे में कृषि विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि पारंपरिक खेती के लिए गोबर मुख्य कारक है, जबकि जैविक खेती के मामले में वर्मीकम्पोस्ट और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है. खेती के दोनों तरीके रसायनों से पूरी तरह मुक्त हैं. वहीं रसायन आधारित खेती न केवल मानव स्वास्थ्य पर, बल्कि मिट्टी और जलवायुकी स्थिति पर भी बुरा प्रभाव डालती है. गाय के गोबर और उसके उत्पादों में खाद, कीटनाशक और कीटनाशकों का उपयोग किया जाएगा, जिसका मिट्टी या मानव स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ेगा.

कृषि उत्पादों की होगी ब्रांडिंग

एक अधिकारी ने बताया कि यह परियोजना राज्य भर में कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में बढ़ाई जाएगी. विभाग ने अब तक पूर्णिया, बक्सर, रोहतास और गया जैसे उन क्षेत्रों में पारंपरिक खेती के लिए अधिकतम संख्या में क्लस्टर की पहचान की है, जहां रासायनिक खेती प्रचुर मात्रा में की जा रही है. एक बार उत्पादन शुरू हो जाने के बाद, विभाग पारंपरिक खेती के प्रमाणीकरण के लिए आगे बढ़ेगा, ताकि उगाए गए कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग की जा सके और बेचा जा सके.

पुनर्जीवित होंगे खेती के प्राचीन तरीके

अधिकारी ने बताया कि विभाग के कृषि विस्तार अधिकारी और कृषि वैज्ञानिक मिलकर किसानों को पारंपरिक खेती के लिए प्रशिक्षित करेंगे और उन्हें अधिकतम उत्पादन के लिए एक विशेष मौसम में उगाई जानेवाली फसलों और सब्जियों के बारे में जागरूक करेंगे. विभाग पारंपरिक बीजों के संरक्षण को बढ़ावा देगा, जिन्हें किसान स्वयं संसाधित करते हैं. बीजामृत, अमृतपानी और जीवामृत प्राचीन काल से पारंपरिक खेती के तीन बुनियादी आधार रहे हैं. हम खेती के प्राचीन तरीके को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं.

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Ashish Jha

लेखक के बारे में

By Ashish Jha

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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