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उर्दू को दूसरी सरकारी जुबान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे

Updated at : 10 Jan 2020 8:54 AM (IST)
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उर्दू को दूसरी सरकारी जुबान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे

स्व. गुलाम सरवर खुद को पत्रकार कहने में बड़ा ही गर्व महसूस करते थे. यही कारण है कि अपने पिता शेख अब्दुल हमीद जो डिप्टी कलक्टर के पद पर पदस्थापित थे उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्होंने आइएएस की जगह पर पत्रकारिता की राह चुनी थी. वह भी उर्दू पत्रकारिता. उस वक्त जब उर्दू और मुसलमान […]

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स्व. गुलाम सरवर खुद को पत्रकार कहने में बड़ा ही गर्व महसूस करते थे. यही कारण है कि अपने पिता शेख अब्दुल हमीद जो डिप्टी कलक्टर के पद पर पदस्थापित थे उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्होंने आइएएस की जगह पर पत्रकारिता की राह चुनी थी. वह भी उर्दू पत्रकारिता. उस वक्त जब उर्दू और मुसलमान एक दूसरे के पर्यायवाची बन गये थे.

उस समय भी एक खास राजनैतिक तबके द्वारा यह समझाने की कोशिश की जा रही थी बंटवारे के जिम्मेदार केवल मुसलमान ही हैं. ऐसा होना भी स्वाभाविक था क्योंकि घर बंटता है तो उसकी कड़वाहट बरसों रहती है यहां तो मुल्क बंटा था.
फिर तल्खी क्यों नहीं होती? सरवर ने छात्र जीवन में 1948 में नौजवान नाम से उर्दू पत्रिका निकाली. सरवर उर्दू से एमए गोल्ड मेडलिस्ट बने. मूल रूप से वे साइंस के विद्यार्थी थे और साइंस कॉलेज से उन्होंने आइएससी प्रथम श्रेणी में पास किया. 1950 में अपने विवाह के उपरांत उर्दू अखबार साथी के संपादक बने. 1953 में संगम के संपादक बने.
संगम के माध्यम से उर्दू और मुस्लिम समाज के साथ भेदभाव के खिलाफ अपनी लेखनी से बिहार की राजनीति को प्रभावित किया. उनके लिखने और बोलने की क्षमता एक जैसी थी. 1967 के चुनाव में उन्होंने नारा दिया था कि जो बिहार में उर्दू को दूसरी सरकारी जबान बनायेगा, उसी को मुसलमान वोट देंगे.
इसके बाद सरवर के आह्वान पर मुस्लिम समाज कांग्रेस के खिलाफ गोलबंद हो गये और कांग्रेसी सत्ता बिहार से चली गयी. महामाया बाबू सीएम बने और शपथ के पहले भोला बाबू, बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर सरवर जी के दानापुर स्थित आवास पर मंत्री पद के शपथ का न्योता दिया.
सरवर जी ने अपने समाजवादी साथियों को यह कहकर विदा किया कि, मुझे पत्रकार ही रहने दीजिए. वे जेपी आंदोलन में भी पूरी शिद्दत के साथ लगे रहे और मुसलमानों को बताया कि यह आंदोलन दिल्ली की सत्ता के खिलाफ है. आज गुलाम सरवर की 91वीं जयंती है. जिसे बिहार की उर्दू आबादी उनके जीवनकाल से ही यौम-ए-उर्दू यानी उर्दू दिवस के तौर पर मनाती रही है.
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