निर्भया गैंगरेप : न्यायमूर्ति आर भानुमति के नेतृत्व में गठित बेंच ने की अक्षय की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 18 Dec 2019 11:06 AM

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नयी दिल्ली : निर्भया गैंगरेप मामले में दोषी करार दिये गये बिहार के औरंगाबाद के अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए नयी बेंच का गठन किया गया है. मालूम हो कि मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने निर्भया गैंगरेप मामले में मौत की सजा पानेवाले अक्षय कुमार सिंह की […]

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नयी दिल्ली : निर्भया गैंगरेप मामले में दोषी करार दिये गये बिहार के औरंगाबाद के अक्षय कुमार सिंह उर्फ अक्षय ठाकुर की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के लिए नयी बेंच का गठन किया गया है. मालूम हो कि मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने निर्भया गैंगरेप मामले में मौत की सजा पानेवाले अक्षय कुमार सिंह की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि उनके एक रिश्तेदार अधिवक्ता अर्जुन बोबड़े मामले में पीड़ित की मां की ओर से पहले पेश हो चुके हैं. ऐसी स्थिति में उचित होगा कि अन्य पीठ पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करे.

निर्भया गैंगरेप मामले में दोषी अक्षय की पुनर्विचार याचिका के लिए गठित नयी खंडपीठ का नेतृत्व न्यायमूर्ति आर भानुमति करेंगी. उनके साथ पीठ में जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एएस बोपन्ना शामिल हैं. मौत की सजा पाये अक्षय ने अपनी पुनर्विचार याचिका में मृत्युदंड के उन्मूलन के नैतिक और व्यावहारिक कारणों को बताते हुए पूर्व प्रधान न्यायाधीश पीएन भगवती की टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया है कि गरीब पृष्ठभूमि वाले अधिकतर दोषियों को फांसी के फंदे तक भेजने की संभावना अधिक रहती है. साथ ही दिल्ली में प्रदूषण के बढ़ते स्तर से स्वास्थ्य को उत्पन्न खतरे का जिक्र करते हुए कहा गया है कि जीवन छोटे से छोटा होता जा रहा है, तो फिर मृत्यु दंड क्यों?

मालूम हो कि 16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में छह पुरुषों द्वारा बस में ‘निर्भया’ नाम की एक युवती के साथ बर्बरतापूर्वक सामूहिक बलात्कार हुआ था. मौत से जूझने के बाद पीड़िता ने दो सप्ताह बाद सिंगापुर के एक अस्पताल में दम तोड़ दिया. मामले में पुलिस ने छह आरोपितों को गिरफ्तार किया था. इनमें से मुख्य आरोपित मामले की सुनवाई के दौरान तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी. वहीं, दोषी ठहराये गये एक आरोपी के किशोर होने के कारण रिमांड होम में तीन साल की सजा सुनायी गयी थी. अन्य चार दोषियों को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने मृत्युदंड दिया है. चारों दोषियों ने अपील के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हालांकि, हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी साल 2017 में हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए मौत की सजा बरकरार रखी. साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने दो दोषियों की समीक्षा याचिकाओं को खारिज कर कर चुकी है.

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