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बिहार कैबिनेट का फैसला : प्रताड़ित होने पर माता-पिता अब डीएम कोर्ट में कर सकते हैं अपील

Updated at : 12 Jun 2019 6:54 AM (IST)
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बिहार कैबिनेट का फैसला : प्रताड़ित होने पर माता-पिता अब डीएम कोर्ट में कर सकते हैं अपील

पटना : बेटे-बेटियों और निकट संबंधियों से प्रताड़ित होनेवाले माता-पिता प्रताड़ना को लेकर अब डीएम के पास अपील कर सकते हैं. प्रताड़ना झेल रहे माता-पिता को अपनी शिकायत के लिए परिवार न्यायालय जाने से मुक्ति मिल गयी है.पहले इसके लिए उनको परिवार न्यायालय में जाना पड़ता था. राज्य सरकार ने अनुभव और कानूनविदों की राय […]

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पटना : बेटे-बेटियों और निकट संबंधियों से प्रताड़ित होनेवाले माता-पिता प्रताड़ना को लेकर अब डीएम के पास अपील कर सकते हैं. प्रताड़ना झेल रहे माता-पिता को अपनी शिकायत के लिए परिवार न्यायालय जाने से मुक्ति मिल गयी है.पहले इसके लिए उनको परिवार न्यायालय में जाना पड़ता था. राज्य सरकार ने अनुभव और कानूनविदों की राय से परिवार न्यायालय से अपील की सुनवाई करने का अधिकार स्थानांतरित कर डीएम को सौंप दिया है.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में मंगलवार को आयोजित कैबिनेट की बैठक में समाज कल्याण विभाग के प्रस्ताव पर माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम-2007 के तहत में गठित अपील अधिकरण के अध्यक्ष अब डीएम को बनाने की मंजूरी दी गयी. बैठक में कुल 15 एजेंडों पर मुहर लगी. कैबिनेट की बैठक के बाद कैबिनेट सचिव संजय कुमार व समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव अतुल प्रसाद ने बताया कि यह कानून पहले से है.
इसमें माता-पिता और वरीय नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा की जिम्मेदारी किसी संतान या निकट संबंधी द्वारा नहीं निभाने पर वे अनुमंडल स्तर पर एसडीओ की अध्यक्षता में गठित ट्रिब्युनल में आवेदन कर सकते थे. एसडीओ के ट्रिब्यूनल के फैसले का पालन नहीं होने पर माता-पिता व वरीय नागरिकों को जिले के परिवार न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कोर्ट में अपील के लिए जाना पड़ता था.
अनुभव में यह पाया गया कि 2007 में बने इस कानून के तहत अब तक कोई भी वरीय नागरिक परिवार कोर्ट में अपनी संतान के खिलाफ अपील में नहीं गया है. उनके पास साधन नहीं थे या कोर्ट के चक्कर में वह अदालत जाने का साहस नहीं जुटा पाते थे. इसे देखते हुए विभाग ने कानूनविदों से राय लेकर अपनी अनुशंसा राज्य सरकार के पास भेजी, जिसकी स्वीकृति मिल गयी है. अब डीएम के पास कोई भी वरीय नागरिक सरलता से पहुंच सकता है और अपनी बात कह सकता है.
इसकी व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए अपील की शक्ति डीएम में स्थानांतरित की गयी है. इससे यह सुविधा होगी कि समाज कल्याण विभाग भी समय-समय पर माता-पिता व वरीय नागरिकों की समस्याओं की मॉनीटरिंग कर सकेगा. परिवार न्यायालय में होने के कारण विभाग उसकी समीक्षा नहीं करता था.
2007 के एक्ट में क्या है प्रावधान
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम-2007 की धारा 25 (2) में सजा का प्रावधान किया गया है. इसके अनुसार इस प्रकार के अपराध को संज्ञेय और जमानतीय अपराध माना गया है. इस मामले में दोषी को थाने से भी जमानत मिल सकती है. अधिनियम में इसे लघु प्रकृति का अपराध माना गया है. अधिनियम सजा के बिंदु पर खामोश है कि इस मामले में दोषी को कितनी सजा दी जाये. इस कानून के तहत एसडीओ का ट्रिब्यूनल बेटे को पैतृक संपत्ति से बेदखल भी कर सकता है.
वृद्धावस्था पेंशन आरटीपीएस के दायरे में, 21 दिनों में होगा निबटारा
कैबिनेट ने वृद्धावस्था पेंशन योजना को लोक सूचनाओं के अधिकार एक्ट के दायरे में लाने की मंजूरी दे दी है. अब हर वरीय नागरिक द्वारा वृद्धावस्था पेंशन के लिए दिये गये आवेदन का 21 दिनों में निबटारा करना होगा. अगर कोई पदाधिकारी निर्धारित समय सीमा में निबटारा नहीं करता तो उसको इसके लिए दंडित करने का प्रावधान है.
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