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मॉनसून पर टिकी किसानों की निगाहें, रहें सतर्क

Updated at : 07 Jun 2019 7:34 AM (IST)
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मॉनसून पर टिकी किसानों की निगाहें, रहें सतर्क

पटना : प्रदेश में धान की रोपाई से पहले की कवायदें अभी तक केवल उन्हीं किसानों ने शुरू की हैं, जिनके पास पानी की व्यवस्था है. हालांकि डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा) के वैज्ञानिकों ने किसानों को सतर्क करते हुए सलाह दी है कि धान की परंपरागत फसल के लिए उन्हें अभी मॉनसून […]

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पटना : प्रदेश में धान की रोपाई से पहले की कवायदें अभी तक केवल उन्हीं किसानों ने शुरू की हैं, जिनके पास पानी की व्यवस्था है. हालांकि डॉ राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा) के वैज्ञानिकों ने किसानों को सतर्क करते हुए सलाह दी है कि धान की परंपरागत फसल के लिए उन्हें अभी मॉनसून का इंतजार करना चाहिए. मॉनसून ने अभी तक भारतीय प्रायद्वीप में कहीं भी दस्तक नहीं दी है.
ऐसे में धान की परंपरागत लंबी अवधि वाली किस्मों के बिचड़ा लगाने के लिए उन्हें अभी इंतजार करना चाहिए. गौरतलब है कि पिछले 10 वर्षों में केवल 2015 को छोड़ दें, तो 2009 के बाद से अब तक मॉनसूनी बारिश में 12 से 37 फीसदी की कमी आयी है. केवल वर्ष 2015 में सर्वाधिक 1500 मिलीमीटर के आसपास बारिश हुई थी, लेकिन इसके बाद 1000 मिलीमीटर से भी कम ही बारिश हुई है. दरअसल लगातार दस साल की कम वर्षा के चलते प्रदेश में भूजल स्तर काफी नीचे गया है. अगर ट्यूबवेल के दम पर धान की फसल को प्रोत्साहित किया गया, तो पीने के लिए पानी की किल्लत भी अगले सीजन तक खड़ी हो सकती है.
पूसा ने भी दी है सलाह : पूसा ने किसानों को न केवल अभी धान के लिए इंतजार करने को कहा है, बल्कि उसने एक आजमायी गयी पद्धति को विस्तार देने की रणनीति भी बनायी है. इस रणनीति के तहत धान को गेहूं की तरह खेत में छींट कर बोवनी की जाती है. इसके बाद तीन पानी दिया जाता है. इसमें किसान को अपनी जरूरत का धान आसानी से हो जाता है. इसमें किसान को परंपरागत धान की खेती की तुलना में 12 से 14 हजार रुपये कम खर्च करने पड़ते हैं.
लगातार बारिश की कमी होती जा रही है. इसलिए धान की परंपरागत खेती के लिए अभी मॉनसून का इंतजार करना चाहिए. चूंकि बिहार के लिए चावल मुख्य खाद्यान्न है, इसलिए इसे छोड़ा नहीं जा सकता है. गेहूं की तरह तीन पानी में होने वाले धान की किस्मों को लोकप्रिय बनाया जा रहा है. किसानों के लिए ये किस्में काफी फायदे वाली हैं. इनको अब विस्तार देने की जरूरत है.
डॉ एनके सिंह, कृषि वैज्ञानिक, पूसा
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